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प्रकृति ने भेदभाव नहीं किया


आज सब बंद है ,
अपने अपने घरों में ,
पंछी सब आजाद है ,
खुले आसमान में ,
सड़के भी खाली है ,हवाएं शुद्ध हो रही है
जमीने भी खाली है, जानवर बेझिझक चर रहे हैं
कैसा सन्नाटा सा पसरा है ,
पक्षियों की चहचहाहट, क्या खूब सुनाई देती है
अमिया की बौर लो आने लगी है, कोयल की कुहुक ,
दूर तक सुनाई देती है
वह छोटी -मोटी सी ….
छोटी सोच वाली गोरिया भी फुर -फुर उड़ रही है ,
यह  कह रही है ,”देखो मैं वापस आ गई “आओ फिर घर- घर खेलते हैं मोर भी बेमौसम  ,
पंख फैलाए नाच रही है
बेखौफ ,बेधड़क
चांद अब धुंधला नहीं दिखता ,
सफेद बॉल की तरह ,
आसमान में टंगा -टंगा
सब पर जादू बिखेर रहा है ,
तारों को भी टिमटिमाना आ गया, लॉकडाउन में हम इंसानों को यह बता दिया कि ,
“पिंजरे में किसे रहने की जरूरत है”
हमें अब मान ही लेना चाहिए ,
हम भी प्रकृति का एक हिस्सा है
“ना कि हम ही हम हैं “
जो नष्ट हुई यह धरती,
हमारा वजूद ही मिट जाएगा ,
पेड़ पौधे फिर उग आएंगे ,
बस हमारा नामो निशान नहीं रहेगा, तो कुछ कर ले अभी,,,,,
चलो मिलकर पर्यावरण को सांवर
दे सभी।

मुनमुन ढाली
रांची
झारखंड
©️®️

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