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कैरोटोमीटर खरीद में घपला:सोने की शुद्धता जांच, सत्यापन करना बाट-माप का काम, मशीन खरीद ली उपभोक्ता मामलात महकमे ने

कैरोटोमीटर खरीद में घपला:सोने की शुद्धता जांच, सत्यापन करना बाट-माप का काम, मशीन खरीद ली उपभोक्ता मामलात महकमे ने

मीडिएशन सेंटर के लिए पैसा नहीं और 2 करोड़ रूपए का खर्चा पाल लिया। - Dainik Bhaskar

मीडिएशन सेंटर के लिए पैसा नहीं और 2 करोड़ रूपए का खर्चा पाल लिया।

सोने की शुद्धता की जांच के नाम पर उपभोक्ता मामलात विभाग ने दो कैरोटोमीटर खरीदे हैं। आचार संहिता से ठीक पहले एक करोड़ रुपए से अधिक के खर्च वाले कैरोटोमीटर खरीद और उसके उपयोग में नियमों की अनदेखी सामने आ रही है। यह मामला विभाग के अंतर्गत कार्य करने वाले लीगल मेट्रोलॉजी सेल का है, जिसका काम व्यापारियों की ओर से से उपयोग में लिए जा रहे बाट-माप के सत्यापन करने का है। उपभोक्ता संरक्षण गतिविधियों के संचालन का है, लेकिन अब कैरोटोमीटर खरीद कर विभाग धातु की माप की नहीं, शुद्धता की जांच का काम भी शुरू करने जा रहा है।

विभाग ने आचार संहिता से ठीक पहले इसके लिए 96 लाख रुपए का वर्कऑर्डर जारी कर दिया था और आचार संहिता के बीच ही उनकी खरीद भी कर ली थी। जबकि विभाग का तर्क है कि जब विभाग का काम उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना है तो वह खुद शुद्धता की जांच क्यों नहीं कर सकता? हालांकि विभाग बाट व माप का सत्यापन करता है, खामियां उजागर करता है। विभाग का काम जांच करना नहीं है, बल्कि माप-तौल में गड़बड़ी कोई कर रहा है तो उसके खिलाफ कार्रवाई करना है। जबकि कैरोटोमीटर का काम धातुओं में मौजूद तत्वों की पहचान करने और उनकी मात्रा निर्धारित करने के लिए किया जाता है। इसमें सोने का कैरट चैक होता है।

कैरोटोमीटर पर 1.14 करोड़ का खर्च
असल में मशीन सहित इंस्टॉलेशन, रखरखाव आदि सहित कुल 96 लाख रुपए का वर्कऑर्डर जारी किया गया था, जिसका टैक्स सहित कुल खर्च 1.14 करोड़ रुपए आया है। इन मशीनों को एसएएएस आधार (सिस्टम एज़ ऑन सर्विस) पर सॉफ्टवेयर और ऑपरेटरों के साथ लिया गया है। वेंडर द्वारा ऑपरेटर उपलब्ध करने के लिए वार्षिक खर्च 6.5 लाख रुपए लिया जा रहा है।
टेंडर की शर्त में 10 लाख तक की मशीनें
क्रेडिट सोसायटी और बैंकों की ओर से ऑनलाइन टेंडर की शर्तों में आमतौर पर इनकी कीमत 10 लाख रुपए तक रखी जाती हैं। ऐसे में विभाग की ओर से खरीदी गई मशीनों की कीमत पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। टेंडर डॉक्युमेंट को विभाग की वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया जाना भी सवाल खड़े कर रहा है। वर्क ऑर्डर में मशीन के मॉडल, मेक और ब्रांड की जानकारी नहीं है, केवल स्पेसिफिकेशन ही दी गई है।

विभाग के ट्रेंड अफसर नहीं, बिजली कंपनी के अधिकारी
पूर्व में उपभोक्ता मामले विभाग में लगे हुए कई अधिकारियों को हटाकर बिजली कंपनी के अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर लाया गया। एक इंस्पेक्टर रैंक पर लिए गए कर्मचारी को 6-7 महीने में ही अस्सिटेंट कंट्रोलर, डिप्टी कंट्रोलर और जॉइंट कंट्रोलर बनाने के लिए भी अधिसूचनाएं तेजी से जारी की गई। महंगी मशीन खरीद और प्रतिनियुक्तियों को भी इस घपले से जोड़कर देखा जा रहा है।

विभाग का काम उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण करना है, तो वह शुद्धता की जांच क्यों नहीं कर सकता। जब कंपनी सप्लाई करती है तो उसकी एसओपी होती है। इसकी जांच के लिए चार महीने की ट्रेनिंग के बाद ही लगाया जा सकता है। विभाग में जिन व्यक्तियों ने ट्रेनिंग ली है, वे ही यह कार्य भी करेंगे। हम जांच करेंगे तो उस मशीन में रिपोर्ट जनरेट तो होगी ही। -नवनीत कुमार, एडीशनल कमिश्नर, उपभोक्ता मामलात

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