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‘हैप्पी’ हाइपोक्सिया, जिसने पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत को हॉस्पिटल पहुंचाया:कोरोना से ठीक हुए लोगों को भी मौत दे सकती है ये बीमारी; कैसे करें पहचान?

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‘हैप्पी’ हाइपोक्सिया, जिसने पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत को हॉस्पिटल पहुंचाया:कोरोना से ठीक हुए लोगों को भी मौत दे सकती है ये बीमारी; कैसे करें पहचान?

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हाल ही में एक गंभीर बीमारी ‘हैप्पी’ हाइपोक्सिया’ से बाहर आए हैं। उन्होंने 8 फरवरी की सुबह 9:13 बजे एक्स पर (टविटर) पोस्ट कर इस कंडीशन की जानकारी दी। साथ ही चेताया कि इस बीमारी की पहचान न हो तो खतरनाक हो सकती है।

COVID-19 से ठीक हो चुके लोगों में यह कंडीशन लगातार बढ़ रही है। इस बीमारी को मेडिकल साइंस में हैप्पी हाइपोक्सिया, साइलेंट हाइपोक्सिया और Covid हाइपोक्सिया भी कहते हैं। नाम में हैप्पी जरूर है लेकिन एक्सपर्ट की मानें तो समय पर इलाज नहीं मिलने पर ये जान भी ले सकती है।

कोरोना से ठीक हो चुके लोगों के लिए यह कितनी चिंताजनक है? कितनी उम्र के लोग शिकार हो रहे हैं? इसके लक्षण कैसे पता लगाएं? ऐसे सवालों का जवाब जानने के लिए हमने शहर के वरिष्ठ मेडिसिन जनरल एक्सपर्ट एवं महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंस के प्रोफेसर वीसी डॉक्टर गणेश नारायण सक्सेना और डॉ. आशीष जैन से बात की।

हैप्पी हाइपोक्सिया क्या है, जिसके चलते पूर्व मुख्यमंत्री को 5-6 दिन एडमिट होना पड़ा?

डॉ. गणेश नारायण सक्सेना बताते हैं हैप्पी हाइपोक्सिया (Happy Hypoxia) टर्म पहली बार COVID-19 के दौरान सामने आई। इस टर्म का मतलब होता है कि पीड़ित के शरीर में ऑक्सीजन का लेवल सामान्य से कम हो जाता है।

ऑक्सीजन लेवल धीरे-धीरे इतना कम हो जाता है कि जानवेला बन जाता है। चिंताजनक बात ये है कि इसका पता मरीज को पता भी नहीं चलता। स्पष्ट लक्षणों के सामने न आने के कारण इसे हैप्पी हाइपोक्सिया और साइलेंट हाइपोक्सिया जैसे नाम दिए गए हैं।

आमतौर पर जब भी ऑक्सीजन लेवल कम होता है तो शारीरिक गतिविधियों के दौरान और सामान्य दिनचर्या में भी व्यक्ति की सांस फूलने लगती है जिससे उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगती है।

लेकिन हैप्पी हाइपोक्सिया में ऑक्सीजन लेवल कम होने के बाद भी व्यक्ति को इसका पता नहीं चलता। न तो उसकी सांस फूलती है और न ही अन्य कोई लक्षण नज़र आते हैं।

डॉ. सक्सेना ने बताया कि सामान्यतः जैसे ही ऑक्सीजन का स्तर कम होता है तो हमारे दिमाग (ब्रेन) में कुछ सेंटर्स होते हैं जो एक्टिव हो जाते हैं और वो तुरंत शरीर में रेस्पिरेशन (सांस लेने की प्रक्रिया) को बढ़ा देते हैं ताकि ऑक्सीजन का लेवल बढ़ जाए और कार्बनडाईऑक्साइड बाहर निकल जाए। हैप्पी हाइपोक्सिया इस तरह के लक्षण नहीं आने से इस कंडीशन को पहचान पाना आसान नहीं होता।

अशोक गहलोत को एसएमएस अस्पताल में भर्ती करवाया गया था, उन्हें कोरोना और स्वाइन फ्लू की पुष्टि हुई थी।

अशोक गहलोत को एसएमएस अस्पताल में भर्ती करवाया गया था, उन्हें कोरोना और स्वाइन फ्लू की पुष्टि हुई थी।

ये कितनी गंभीर बीमारी है?

दरअसल कोरोना वायरस से लड़ने के बाद शरीर में कई तरह के रिएक्शन सामने आए हैं, इन पर शोध किया जा रहा है। अब तक जो रिसर्च हुई है उससे पता चला है कि कोविड से ठीक हो चुके मरीजों में सबसे गंभीर कंडीशन में से एक हैप्पी हाइपोक्सिया है। इसमें शरीर में ऑक्सीजन का सैचुरेशन कम हो जाता है। हीमोग्लोबिन से लंग्स (फेफड़े) को जिस मात्रा में ऑक्सीजन ग्रहण करनी चाहिए, वह नहीं कर पाते हैं।

गंभीर मामलों में मरीज को वेंटीलेटर की जरूरत पड़ती है। अगर समय पर ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं मिले तो मौत भी हो सकती है। पोस्ट कोविड के बाद इस तरह के मामले ज़्यादा सामने आए हैं। हालांकि आईसीएमआर की रिसर्च में अभी तक कोई स्पेसिफिक कारण सामने नहीं आए हैं।

पहचाना कैसे जाए, क्या तरीका है?

हमने जब पूछा कि आम जिंदगी में अगर इस बीमारी की पहचान करनी हो तो उसका आसान तरीका क्या होगा? इस पर डॉ. सक्सेना ने बताया कि समान्यत: इस बीमारी के लक्षण दूसरी बीमारियों की तरह नहीं उभरते, इसलिए ही इसे खतरनाक माना गया है। इसी कारण से इसे हैप्पी हाइपोक्सिया और साइलेंट हाइपोक्सिया जैसे नाम दिए गए हैं। किसी व्यक्ति को ‘हैप्पी हाइपोक्सिया’ है या नहीं इसे जानने के दो आसान तरीके हैं…

वॉक करने के बाद सांस फूलती है तो यह हैप्पी हाइपोक्सिया के संकेत हो सकते हैं।

वॉक करने के बाद सांस फूलती है तो यह हैप्पी हाइपोक्सिया के संकेत हो सकते हैं।

01) 6 मिनट वॉक

साधारण स्पीड से 6 मिनट पैदल चलने पर अगर सांस फूल रही है या चलने में परेशानी हो रही है तो ऑक्सीजन का लेवल तुरंत चेक करना चाहिए। क्योंकि एकदम स्वस्थ आदमी को छह मिनट सामान्य गति से चलने पर ऐसी परेशानी नहीं होती। अगर आपको पैदल चलते समय सांस फूलने, सीने में भारीपन महसूस हो, धुंधला दिखाई देने लगे, अचानक से सोचने समझने में परेशानी होने लगे, सांस भरने या थकान महसूस हो रही हो तो यह हाइपोक्सिया के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं। यह एक ऐसा परीक्षण है जिसके लिए किसी मेडिकल टेस्ट की जरूरत नहीं पड़ती। इससे आपको अपनी कंडीशन का पता चल जाएगा।

02) डिजिटल ऑक्सीमीटर से चेक करें ऑक्सीजन लेवल

पोर्टेबल ऑक्सीमीटर को फिंगर पर लगाकर अपना SPO2 लेवल चेक कर सकते हैं।

पोर्टेबल ऑक्सीमीटर को फिंगर पर लगाकर अपना SPO2 लेवल चेक कर सकते हैं।

पहले परीक्षण में के दौरान अगर किसी को कोई लक्षण नजर आता है तो अब आपको अपने शरीर में ऑक्सीजन के लेवल चेक करना चाहिए। घर पर ऑक्सीजन का लेवल जानने के लिए COVID-19 के दौरान पोर्टेबल पल्स ऑक्सीमीटर (Spo2) उपलब्ध रहने लगे हैं। ऑक्सीमीटर से जांच करने के दौरान अगर 6 मिनट बाद आपके शरीर में ऑक्सीजन लेवल 90% या 85% है या लगातार कम हो रहा है तो आपको तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

ऑक्सीमीटर से ऑक्सीजन लेवल चेक करने का सही तरीका

महात्मा गांधी हॉस्पिटल के क्रिटिकल केयर मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. आशीष जैन ने बताया कि ऑक्सीमीटर का सही इस्तेमाल आना बहुत जरूरी है। जनरली हम ऑक्सीमीटर लगाते ही पहली रीडिंग जो आती है उसे ही सही मान लेते हैं। जबकि ऑक्सीमीटर लगाने के बाद जब वेव फॉर्म बनने लगे उसके बाद कम से कम 20 से 30 सेकंड्स इंतजार करने के बाद रीडिंग लेनी चाहिए। इतने समय में पल्स और सैचुरेशन सेटल हो जाता है। अगर आप दौड़कर, चलकर, सीढ़ी से या एक्सरसाइज करके आए हैं तो थोड़ा इंतजार होने के बाद ही इसका इस्तेमाल करें इससे आपको सही रीडिंग मिलेगी।

कब जाएं डॉक्टर के पास?

चूंकि हैप्पी हाइपोक्सिया में लक्षण का पता नहीं चलता है, इसलिए कोविड के मरीजों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए। अगर चलते समय सांस लेने में मामूली परेशानी हो तो सबसे पहले ऑक्सीजन लेवल चेक करना चाहिए। यदि ऑक्सीजन लेवल कम है तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएं।

स्वस्थ व्यक्ति में ऑक्सीजन का लेवल 94 से ज्यादा होना चाहिए। अगर ऑक्सीमीटर में ऑक्सीजन लेवल 90% से कम है तो यह हाइपोक्सिया के लक्षण हो सकते हैं, ऐसे में डॉक्टर को जरूर दिखाएं। मरीज के शरीर में इससे कम परसेंटेज हो तो मस्तिष्क को आवश्यक ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है, जिससे भ्रम और सुस्ती पैदा होती है। स्तर 80% तक गिर जाता है, जिससे महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचने का खतरा होता है।

कितनी उम्र के लोगों में सामने आ रही यह बीमारी?

हैप्पी हाइपोक्सिया का किसी खास उम्र से जुड़ाव को डॉक्टर्स नकारते हैं। यानी यह किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है। हालांकि कुछ समूह ऐसे जरूर हैं जिनके हाइपोक्सिया से ग्रसित होने की आशंका ज्यादा है।

इनमें फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे लोग, सिगरेट पीने वालों में, AC फैक्ट्रीज में काम करने वालों में जहां हवा में बारीक धूल कण, धुंआ, मिट्टी, पार्टिकल्स ज्यादा हों, डायबिटीज से ग्रसित, जिनकी हार्ट सर्जरी (स्कीमिक हार्ट डिज़ीज़) हो चुकी हो या किसी क्रॉनिकल डिजीज से ग्रसित हों। ऐसे लोगों में यह दिक्कत ज्यादा बढ़ गई है।

कोरोना के बाद से हाइपोक्सिया के मामले ज्यादा बढ़ गए हैं।

कोरोना के बाद से हाइपोक्सिया के मामले ज्यादा बढ़ गए हैं।

किन अंगों पर सबसे पहले होता है असर?

डॉ. आशीष जैन ने बताया कि साइलेंट हाइपोक्सिया कोविड और वायरल इन्फेक्शंस में ज्यादा नजर आता है। जनरली 5 से 60 परसेंट रोगियों में यह मिलता है कि ऑक्सीजन लेवल तो कम है लेकिन लक्षण नहीं दिखाई दे रहे। जहां तक अंगों के प्रभावित होने की बात है तो शरीर के वो टिश्यूज जहां ऑक्सीजन की सबसे ज्यादा डिमांड है जैसे ब्रेन, हार्ट, किडनी और लंग्स पर ऑक्सीजन के कम होने का असर सबसे पहले दिखाई देगा। लंग्स की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। हार्ट पर भी गहरा असर होता है, हार्ट अटैक और स्कीमिया की संभावना बढ़ जाती है। किडनी फेल्योर से यूरिनल संबंधी परेशानी हो सकती है।

क्या हैप्पी हाइपोक्सिया, साइलेंट हाइपोक्सिया और कोविड हाइपोक्सिया अलग-अलग हैं?

इस मेडिकल कंडीशन को डॉक्टर्स हाइपोक्सिया, हैप्पी हाइपोक्सिया, साइलेंट हाइपोक्सिया और कोविड हाइपोक्सिया भी कहते हैं। हमने जब इनमें अंतर पूछा तो डॉ. गणेश नारायण सक्सेना ने बताया कि साइंटिफिक टर्म के तौर पर अभी इन्हे स्वीकृत नहीं किया गया है, लेकिन कुछ चीजें महामारी के दौरान इस तरह प्रचालित हो जाती हैं कि वो हमारी आम जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं। हाइपोक्सिया के मामले में भी कुछ ऐसा ही है। कोविड को अभी दो-तीन साल ही हुए हैं।

ऑक्सीजन लेवल कम होने से लंग्स की क्षमता घट जाती है।

ऑक्सीजन लेवल कम होने से लंग्स की क्षमता घट जाती है।

इसलिए इससे जुडी विभिन्न मेडिकल कंडीशन पर रिसर्च हो रही है। हालांकि यह सिर्फ हाइपोक्सिया है जिसे इंटरचेंजबली अलग अलग मामलों में लक्षणों के आधार पर साइलेंट हाइपोक्सिया और कोविड हाइपोक्सिया कहा जाता है। क्योंकि शरीर में बुखार की वजह से भी ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है। रूटीन लाइफ में भी कई बार सर्दी जुकाम, हल्का निमोनिया या अस्थमा के कारण ऑक्सीजन लेवल कम हो जाता है। हां जिनको कोविड हो चुका है उनमें हाइपोक्सिया की कंडीशन बढ़ जाती है। इससे ब्रेन और हार्ट सबसे पहले प्रभावित होते हैं। इसलिए अगर कोई परेशानी न भी हो, तो भी समय समय पर ऑक्सीजन लेवल चेक करते रहना चाहिए।

हार्ट पर भारी पड़ सकती है यह ‘हैप्पी’ कंडीशन

डॉ. सक्सेना का कहना है कि अगर इस कंडीशन का समय पर पता न चले या अस्पताल पहुंचने में देर हो जाए तो यह हमारे दिल के लिए भारी पड़ सकती है। अगर हाइपोक्सिया एक सर्टेन लेवल से आगे बढ़ गया है तो यह अचानक पेशेंट को तकलीफ दे सकता है। साथ ही हमारे हार्ट पर भी घातक असर डाल सकता है। अगर किसी व्यक्ति को गंभीर हाइपोक्सिया है तो उसे तुरंत इलाज न मिलने पर मौत होने का जोखिम भी होता है। गंभीर मामलों में हॉस्पिटल में भर्ती के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं है।

अशोक गहलोत ने यह कहा था ट्वीट में

हाल में तमाम नई रिसर्च से पता चला है कि कोविड के दौरान एवं कोविड के बाद भी शरीर में ऑक्सीजन लेवल की कमी हो जाती है जिसे ‘हैप्पी हाइपोक्सिया’ कहते हैं। इस बीमारी में कई बार मरीज को भी पता नहीं चलता, क्योंकि सांस लेने में भी तकलीफ नहीं होती परन्तु समय पर डाइग्नोसिस ना हो तो यह बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

पूर्व मुख्यमंत्री की ओर से की गई पोस्ट।

पूर्व मुख्यमंत्री की ओर से की गई पोस्ट।

मेरे साथ भी कोविड के कारण हैप्पी हाइपोक्सिया की स्थिति बनी पर डॉक्टर्स ने इसे समय रहते पहचान लिया परन्तु इससे मुझे 5-6 दिन बहुत परेशानी हुई। अगर आपको शरीर में कोई भी परेशानी लगे तो अपना ऑक्सीजन लेवल जरूर चेक करते रहें।

आजकल तमाम तरह के वायरल इंफेक्शन फैल रहे हैं इसलिए डॉक्टर्स भी मरीजों को समय-समय पर ऑक्सीमीटर का इस्तेमाल कर ऑक्सीजन लेवल मापने की सलाह अवश्य देंवे।

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