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पर उपदेश कुशल बहुतेरे ,जे आचरहिं ते नर न घनेरे: शायद यही हुआ है उड़न परी पी टी उषा के साथ, भूल गईं हैं वो मई 2009 का वो वाकया, पढ़ें पहलवानों के धरने पर बैठने की पूरी कहानी

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*पर उपदेश कुशल बहुतेरे ,जे आचरहिं ते नर न घनेरे:  शायद यही हुआ है उड़न परी पी टी उषा के साथ, भूल गईं हैं वो मई 2009 का वो वाकया, पढ़ें पहलवानों के धरने पर बैठने की पूरी कहानी
*Dr Mudita Popli*
मई 2009  की घटना है , भोपाल में 49वीं राष्ट्रीय ओपन एथलेटिक्स मीट हो रही थी। मीट में पी टी ऊषा भी पहुँची थीं परंतु  वे दौड़ने के लिए नहीं आई थीं बल्कि उनके साथ उनसे ट्रेनिंग हासिल की हुई कुछ युवा लड़कियां थीं जिन्हें मीट के लिए चुना गया था। वहां स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इण्डिया ने ऊषा के रहने का जहाँ इंतजाम किया था वो बेहद घटिया और गंदी जगह थी।उड़न परी और देश का गौरव जैसे नामों से पुकारी जाने वाली इस विनम्र चैम्पियन खिलाड़ी के लिए ढंग के कमरे तक की व्यवस्था न कर सकने वाली देश की सर्वोच्च खेल संस्था की इससे  बहुत किरकिरी हुई  जब ऐसे व्यवहार से आहत ऊषा ने प्रेस कांफ्रेंस कर पूरे  देश को इस नाइन्तजामी के बारे में बताया।उस कांफ्रेंस मे पी टी ऊषा के आंसू निकल पड़े थे। पी टी ऊषा के आंसू देख कर सारे देश में क्षोभ फ़ैल गया और  तत्कालीन खेलमंत्री मनोहर सिंह गिल को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी थी।
वह खिलाड़ी जिसने केवल रहने का सही इंतजाम ना होने के चलते प्रेस वार्ता करने का निर्णय लिया आज एक महिला के सम्मान की बात होने पर इस तरह के बयान जारी कर रही है यह अपने आप में क्षोभ का विषय है।
इस पूरे मामले को टटोलें तो जनवरी में देश के शीर्ष पहलवानों ने जब कड़ाके की ठंड में भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण और कोच के खिलाफ मोर्चा खोला तो हर कोई हैरान रह गया था।इसके बाद सरकार ने तुरंत पहलवानों से बातचीत शुरू कर दी और जांच समिति का गठन कर धरना प्रदर्शन को समाप्त करवा दिया।जनवरी में डब्ल्यूएफआई के अध्यक्ष पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए ओलंपियन पहलवान दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठ गए थे। अगले दिन कई राज्यों के पहलवान और खाप पंचायतों के प्रतिनिधियों, कोच व खिलाड़ियों ने पहलवानों को समर्थन देते हुए उनके प्रदर्शन में भाग लिया था।
पहलवानों ने मनमानी करने और महिला पहलवानों के यौन शोषण के भी आरोप अध्यक्ष पर लगाए थे। तीन दिन के धरने के बाद केंद्रीय खेल मंत्रालय ने जांच कमेटी बनाते हुए एक महीने में जांच की बात कहते हुए कार्रवाई का भरोसा दिया था।इसके बावजूद तीन महीने बीतने के बाद भी जब  जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई तब पहलवानों ने फिर से धरने का निर्णय लिया। इस बीच ओलंपियन बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट के साथ पहलवानों ने बड़े टूर्नामेंटों में खेलने का बहिष्कार कर दिया था लेकिन बाद में पहलवान खेलने लग गए थे। बजरंग और विनेश ने अपना बहिष्कार जारी रखा था। इसके बाद पिछले महीने बजरंग, संगीता और विनेश की विदेश में ट्रेनिंग मंजूर की गई थी लेकिन वे नहीं गए। पहलवानों ने कहा है कि न्याय मिलने तक वे नहीं खेलेंगे।  
यहां तक कि इस बीच दिल्ली महिला आयोग (डीसीडब्ल्यू) चीफ स्वाति मालीवाल ने महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न मामले में एफआईआर दर्ज न होने पर दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया। महिला पहलवानों ने आयोग से शिकायत की थी कि उन्होंने 2 दिन पहले दिल्ली पुलिस को लिखित शिकायत दी है, लेकिन अभी तक उनकी एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।  
हालांकि इस मामले में अब सरकार ने संज्ञान लिया है केंद्रीय खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने  मध्यस्थता कर कहा कि कोई भी एफआईआर दर्ज करा सकता है।सरकार खिलाड़ियों के साथ है पर इस बीच जिस एक बयान ने माहौल को गर्म कर दिया वह बयान आया उड़न परी पीटी उषा के द्वारा। वो पी टी उषा जिन्हे देश में बहुत सम्मान की निगाह से देखा जाता है।जो  भारतीय ओलंपिक संघ की निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित हुई हैं। वे आईओए के 95 साल के इतिहास में अध्यक्ष बनने वाली पहली ओलंपियन हैं। उषा देश की सबसे सफल एथलीटों में से एक रही हैं और उन्होंने एशियन गेम्स में चार स्वर्ण सहित 11 पदक जीते थे। पीटी उषा को इसी साल राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया गया था। ऐसी महान धाविका की ऐसी टिप्पणी खिलाड़ियों के मनोबल को तोड़ने का कार्य किया है।पीटी उषा आईओए की कार्यकारी समिति की बैठक में शामिल हुई थीं।इस बैठक के बाद उन्होंने कहा कि, ”मेरा मानना है कि यौन उत्पीड़न की शिकायतों के लिए IOA की एक समिति और एथलीट आयोग है। सड़कों पर जाने के बजाय उन्हें (पहलवानों को) हमारे पास आना चाहिए था, लेकिन वे IOA में नहीं आए।वे इस बात पर अड़े हैं कि जब तक उनकी मांग पूरी नहीं हो जाती तब तक वे धरना खत्म नहीं करेंगे। थोड़ा तो अनुशासन होना चाहिए।हमारे पास न आकर वे सीधे सड़कों पर चले गए हैं, यह खेल के लिए अच्छा नहीं है।वे जो कर रहे हैं वह देश की छवि के लिए अच्छा नहीं है।”
जब पी टी ऊषा भोपाल में रोई थी किसी ने नहीं कहा कि आप ने प्रेस वार्ता क्योंकि सब ने उनकी बात का मान रखा और वही पी टी उषा  आज वह एक शातिर प्रशासक की भाषा बोल रही    हैं। शायद सत्ता का मद व्यक्ति को संवेदनहीन बना देता है।वीरेन डंगवाल की कविता “मेरे गरीब देश की बेटी” की नायिका पीटी उषा को शायद फिर से एक बार खिलाड़ी बनके सोचने की जरूरत है ताकि विश्व के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश के खिलाड़ी अपना समय और अपनी योग्यता अपने खेल को दे सकें राजनीति में पड़कर देश को मेडल मिलने की ये दौड़ कहीं अधूरी ना रह जाए।

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