
बचपन के सारे शौक अधूरे रह गए, बक्से मे टूटे खिलौने बंद रह गए।
कहीं नहीं मिला सुकून जीवन के किसी मोड़ पर,
वो सारे बिछड़े ना जाने कहाँ खो गए।
हाथों से बनी पेंटिंग कहीं कोने में पड़ी है,
दीवार पर लगे रंग फीके रह गए।
मिलते नहीं अब होली मे साथ खड़े,
हर त्यौहारों की रौनक सिमट कर रह गई।
जिनके होने से गूँजा करती थी घर की दीवारें,
वो सभी अब अनकही यादों में रह गए।
छत की ज़मीन चटक सी गई है अब,
उन घरों के दरवाजे बंद तालों में रह गए।
जिन किताबों के अक्षर अभी तक नहीं पढ़े,
उन किताबों के पन्ने भी चूहे ले गए।
चूल्हे में पकाती थी अम्माँ स्वादिष्ट भोजन,
उन चूल्हों के अवशेष वहीं पड़े रह गए।
जिन झूलो में बैठकर बीता है बचपन,
उन झूलो को कबाड़ी उठा कर ले गए।
बुजुर्गों की कहानियों में जिक्र था गुड़ियों का,
उन गुड़ियों के नामों निशाँ खो गए।
ना जाने क्यूँ नहीं मिलता हर सवालों का जवाब,
खो गई पुरानी बस्ती की गलियाँ।
नहीं मिलते अब परियों के किस्से,
ना जाने कहाँ खो गया हर यादों का “अस्तित्व”।
“पूजा गुप्ता”
मिर्जापुर उत्तर प्रदेश















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