
बेटी कहती थी पैरों पर पायल सुंदर लगती है
माँ वहीं लाना विदा करते समय।
अब वो बेटी हिलते होठों से कहती है….
पैरों पर मेहंदी से पायल नहीं, ज़ंजीर बनाना।
सुनो मेरी माँ जिन हाथों में घड़ी पहनती थी मैं,
उन हाथों में विदा करते समय बेड़ियाँ लाना।
नहीं मिलेगी आजादी मुझे अब उस घर में,
जब भी आना मेरे लिए बस दुआ लाना।
मुझे देने के लिये तुमने दहेज जमा की हो,
वो सब मेरे लिए नहीं ससुराल के लिए लाना।
अब बंदिश में रहेगी मेरी हर स्वतन्त्रता,
मुझे विदा करते समय सलाखें लाना ।
झोंक देती थी तुम बलैया मेरी चूल्हे में
अब वो चूल्हे मुझे यहाँ नहीं मिलेंगे माँ।
नहीं देना अब मुझे कोई सस्ते सामान,
सोना चाँदी से भरी पोटली लाना।
जब मैं तुम्हारीं चौखट पार करूँ,
फिर दोबारा मुझे ज़ल्दी नहीं बुलाना माँ।
तुम भेज रहीं हो मुझे दूसरे संसार में,
तो मेरे लिए डोली भी बंद द्वार वाली लाना।
स्वरचित और मौलिक रचना
“पूजा गुप्ता”
मिर्जापुर उत्तर प्रदेश












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