भारत का रुपया एशिया में सबसे तेज गिर रहा:पाकिस्तानी रुपया मजबूत हुआ; आखिर सरकार से कहां चूक हो रही

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भारत का रुपया एशिया में सबसे तेज गिर रहा:पाकिस्तानी रुपया मजबूत हुआ; आखिर सरकार से कहां चूक हो रही

डॉलर के मुकाबले भारत का रुपया एशिया में सबसे तेजी से गिर रहा है। पिछले 5 महीने में 6% से ज्यादा टूटा। जबकि इसी दौरान पाकिस्तानी रुपया 0.5% और चीनी युआन तो 3% मजबूत हो गया। नीचे बाकी देशों का हाल देखिए-

आगे बढ़ने से पहले डॉलर और रुपए का रिश्ता समझ लेते हैं-

दुनिया में एक बाजार है- फॉरेक्स मार्केट, यानी रोकड़ मंडी। ये मंडी किसी एक बिल्डिंग में नहीं होती। ये डिजिटली चलती है, जिसमें दुनियाभर के बैंक, इन्वेस्टमेंट फर्म, एक्सपोर्ट-इंपोर्ट कंपनियां करेंसी खरीदती-बेचती हैं।

इकोनॉमिक्स का सबसे बुनियादी उसूल है- जिसकी मांग ज्यादा, उसकी कीमत ज्यादा।

दुनिया का 88% कारोबार डॉलर में होता है। तो सभी देश डॉलर रखना ही चाहेंगे। इसी के चलते सभी देशों के पास जितनी भी विदेशी करेंसी है, उसमें करीब 57% तो डॉलर ही है। इसीलिए रोकड़ मंडी में भी डॉलर को ग्लोबल करेंसी मान लिया गया है। अब इसी के आधार पर बाकी देशों की करेंसी नापी-जोखी जाती है।

फिलहाल रोकड़ मंडी में डॉलर की मांग बहुत ज्यादा है। भारत में भी डॉलर जितना आ रहा है, उससे ज्यादा खर्च हो रहा है। इसलिए रुपया तेजी से गिर रहा है। इस वक्त 1 डॉलर 95 रुपए के आस-पास ट्रेड कर रहा है।

ये तो हुई सिंपल परिभाषा। अब जानिए वो फैक्टर जिनकी वजह से रुपया इतना तेजी से टूटा…

1. कच्चे तेल का दाम बढ़ा, ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़े

  • भारत अपनी खपत का 85% से ज्यादा तेल विदेशों से खरीदता है। इसकी पेमेंट सिर्फ डॉलर में हो सकती है। देश के इम्पोर्ट बिल में 22% की हिस्सेदारी के साथ तेल पहले नंबर पर है।
  • ईरान जंग के दौरान कच्चे तेल के दाम 72 डॉलर से बढ़कर 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए थे। 3 जून को भी भाव 88.7 डॉलर पर है।
  • क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA के मुताबिक, कच्चे तेल का भाव 10 डॉलर बढ़ने पर भारत के इम्पोर्ट बिल पर 14-16 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ने से रुपया कमजोर हो गया।

2. विदेशी निवेशकों ने भारत से अंधाधुंध डॉलर निकाले

  • भारत में विदेशी निवेशक दो तरह से पैसा लगाते हैं। पहला- शेयर बाजार में FII (फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर) से। दूसरा- किसी कंपनी, व्यापार या इंफ्रास्ट्रक्चर में सीधे FDI (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट) से।
  • 2025 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 1.66 लाख करोड़ रुपए निकाले थे। 2026 के शुरुआती 5 महीनों में ही 2.26 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा निकाल चुके हैं।
  • विदेशी निवेशक शेयर बाजार से डॉलर में पैसा निकालते हैं। इससे मार्केट में डॉलर की डिमांड बढ़ती है, जिससे रुपया टूटता है।
  • अर्थशास्त्री डॉ. शरद कोहली कहते हैं कि सितंबर 2024 के बाद से विदेशी निवेशक मुनाफा कमाकर भारत से पैसा निकाल रहे हैं। भारतीय शेयर बाजार का PE रेशियो दूसरे उभरते बाजारों से ज्यादा है। PE रेशियो, यानी निवेशक एक रुपए की कमाई के लिए कितने रुपए लगा रहा है।
  • इसी तरह FDI देश में डॉलर आने का बड़ा जरिया है। भारत भी विदेशों में डॉलर में ही निवेश करता है। FDI के जरिए भारत में आए डॉलर और बाहर गए डॉलर का अंतर, यानी नेट FDI 2022-23 में 28 अरब डॉलर था, जो 2024-25 में घटकर महज 1 अरब डॉलर रह गया है। मतलब भारत में डॉलर आना कम हो गया।
  • इन्हीं वजहों से भारतीय शेयर बाजार ग्लोबल रैंकिंग में चौथे से सीधे सातवें नंबर पर आ गया। नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड के आंकड़ों के मुताबिक विदेशी निवेशकों ने पिछले 10 साल में जितना पैसा लगया उतना निकाल लिया है।

3. रुपया टूटने की अटकलबाजी से रुपया और टूटा

  • अर्थशास्त्री डॉ. जयति घोष मानती हैं कि घरेलू ट्रेडर्स बार-बार कयास लगा रहे हैं कि रुपया और गिरेगा। वे इस पर सट्टा खेल रहे हैं। इन अटकलबाजियों से रुपया लगातार टूट रहा है।
  • अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार बताते हैं कि घरेलू अटकलबाजियों के चलते भारतीय एक्सपोर्टर्स ने अपनी कमाई के डॉलर विदेशों में रोक रखे हैं। उन्हें उम्मीद है कि रुपया और गिरेगा, जिससे डॉलर के बदले ज्यादा रुपए मिलेंगे। वहीं भारतीय इम्पोर्टर्स ज्यादा खरीदी कर रहे हैं। उन्हें डर है कि रुपया टूटने पर सामान महंगा पड़ेगा।
  • एक्सपर्ट्स कहते हैं कि इन अटकलबाजियों के चलते विदेशी निवेशक और विदेशों में रह रहे भारतीय, यानी NRIs भी देश में जमा या निवेश किया हुआ पैसा निकाल रहे हैं।

4. भारतीय अर्थव्यवस्था पर भरोसे की कमी

  • अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार बताते हैं, ‘डोनाल्ड ट्रम्प के सत्ता संभालने के बाद भारत पर 50% तक टैरिफ लगाया। इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड, यानी IMF ने भारत की जीडीपी कैलकुलेशन पर सवाल उठाए। इनके चलते निवेशकों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर भरोसा कम हुआ। इसलिए भारत में डॉलर कम आ रहे हैं।’

इसके अलावा ‘डॉलर इंडेक्स’ में भी तेजी आई है। डॉलर इंडेक्स 6 बड़ी करेंसी- यूरो, जापानी येन, ब्रिटिश पाउंड, कनाडाई डॉलर, स्वीडिश क्रोना और स्विस फ्रैंक के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की स्थिति दिखाता है। ईरान जंग शुरू होने के बाद ये 97.6 से 99 तक पहुंच गया। बीच में 100 के पार भी गया। इसका मतलब है कि पूरी दुनिया में डॉलर की डिमांड बढ़ी है, जिसके चलते डॉलर मजबूत हो रहा है।

25 मई को केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, 'मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए हमें 3F- फ्यूल, फर्टिलाइजर और फॉरेक्स पर फोकस करने की जरूरत है।

25 मई को केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, ‘मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए हमें 3F- फ्यूल, फर्टिलाइजर और फॉरेक्स पर फोकस करने की जरूरत है।

ऐसे में सवाल उठता है- जब चीन-पाकिस्तान की करेंसी मजबूत हुई, फिर भारत से कहां चूक रही?

2004 से 2014 के बीच, यानी 10 साल में डॉलर के मुकाबले रुपए 45 से गिरकर 59 तक पहुंचा, यानी 31.1% गिरा। औसतन हर साल करीब 3% की गिरावट। वहीं 2014 के बाद, यानी पिछले पिछले 12 सालों में रुपया 61% टूटा। यानी हर साल औसतन 5% गिरा।

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि भारत सरकार से मोटे तौर पर 3 चूक हो रही है…

1. नई तकनीक में निवेश नहीं, तो कमाई कहां से होगी?

  • दुनियाभर में AI और न्यू टेक्नोलॉजी की क्रांति मची है। अमेरिका AI पर 500 अरब डॉलर और चीन 80 अरब डॉलर खर्च कर रहा है, जबकि भारत सिर्फ 2 अरब डॉलर।
  • यही फर्क शेयर बाजार में भी दिखता है। अमेरिका, चीन और दूसरे देशों के बाजार चढ़ रहे हैं, जबकि भारत का बाजार झटके खा रहा है।
  • इसकी वजह है- ‘रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर कम खर्च’। भारत R&D पर अपनी GDP का सिर्फ 0.65% खर्च करता है। जबकि चीन और अमेरिका करीब 3% खर्च करते हैं।
  • सीधे शब्दों में कहे तो चीन की इकोनॉमी हमसे 5 गुना बड़ी है, लेकिन वो रिसर्च पर 22 गुना ज्यादा खर्च करता है। 20 गुना बड़ी इकोनॉमी वाला अमेरिका तो 100 गुना ज्यादा।
  • प्रो. अरुण कुमार कहते हैं कि जब नई तकनीक बनेगी ही नहीं, तो दुनिया को क्या बेचेंगे? जब बेचेंगे नहीं, तो डॉलर कहां से आएगा? ऐसे में सरकार R&D पर ज्यादा खर्च करे। इंस्टीट्यूट्स और यूनिवर्सिटीज में रिसर्च का माहौल बने। सरकार के साथ प्राइवेट सेक्टर भी R&D पर खर्च बढ़ाए। नहीं तो AI के दौर में उन्हें भारी नुकसान होगा।

2. तकनीक नहीं, तो ज्यादा सामान कैसे बनेगा?

  • बेहतर तकनीक नहीं होने के कारण भारत मैन्युफेक्चरिंग, यानी सामान बनाने के मामले में बहुत पीछे है। इसके चलते भारत एक कंज्यूमर मार्केट बनकर रह गया है।
  • डॉ. कोहली कहते हैं, सरकार ने मैन्युफेक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ शुरू किया, लेकिन इसका शेर धीरे से गरजा। वहीं जो स्टार्ट-अप या बिजनेस शुरू हो रहे हैं, वो ज्यादातर सर्विस और एप-बेस्ड हैं। जैसे- डिलिवरी एप, ई-कॉमर्स एप, मेड सर्विस। ये काम के हैं, लेकिन इनसे विदेशी मुद्रा नहीं कमाई जा सकती।
  • देश में ज्यादा डॉलर तब आता है, जब हम कुछ बनाकर दुनिया को बेचते हैं- चाहे इलेक्ट्रिक सॉकेट हो या फाइटर जेट का इंजन।
  • डॉ. कोहली सलाह देते हैं कि सरकार को स्कूल-कॉलेज से ही बच्चों को इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्सटाइल या दूसरे प्रोडक्ट बनाने की ट्रेनिंग देनी चाहिए। साथ ही सरकार और प्राइवेट सेक्टर दोनों को मिलकर मैन्युफेक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना चाहिए।

3. ज्यादा सामान नहीं बनेगा, तो बेचेंगे क्या?

  • ज्यादा डॉलर न आने में यही सबसे बड़ी समस्या है। 2025-26 में भारत ने 860 अरब डॉलर का सामान बेचा, लेकिन 979 अरब डॉलर का खरीदा। यानी 119 अरब डॉलर का घाटा।
  • भारत सबसे ज्यादा पेट्रोलियम प्रोडक्ट (पेट्रोल-डीजल), सोना-चांदी के गहने और दवाइयां विदेशों में बेचता है, लेकिन इनमें मुनाफा कम होता है। जबकि जिनमें मुनाफा ज्यादा है, जैसे- इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, ऑटो पार्ट्स वगैरह उनमें भारत कहीं पीछे है। चीन, वियतनाम और ताइवान इसमें आगे हैं।
  • प्रो. अरुण और डॉ. कोहली दोनों ही मानते हैं कि अगर रुपए को लंबे वक्त तक मजबूत रखना है, तो सरकार को एक्सपोर्ट और उससे जुड़ी पॉलिसी को मजबूत करना होगा।
  • इसमें लॉजिस्टिक्स यानी माल पहुंचाने की दिक्कत भी है। वर्ल्ड बैंक के लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स में भारत 38वें नंबर पर है। क्योंकि बॉर्डर और बंदरगाहों पर कस्टम्स क्लियरेंस की प्रोसेस डिजिटल होने के बावजूद विकसित देशों जितनी तेज नहीं है। एक्सप्रेसवे और बड़े पोर्ट्स तो अच्छे बन गए, लेकिन गांवों या टियर-2 शहरों की हाईवे से कनेक्टिविटी अब भी दुरुस्त नहीं है।
  • हालांकि सरकार ने 2 डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर शुरू किए हैं, जबकि 3 पर काम जारी है। उम्मीद है कि इससे माल ढुलाई में देरी कम होगी।

गिरते रुपए को रोकने के लिए फिलहाल RBI क्या कर रहा?

  • देश की आर्थिक स्थिति की जिम्मेदारी भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI की है। जब भी रुपया डूबता है, तो RBI उसे संभालने के लिए अपने विदेश मुद्रा भंडार से डॉलर या ट्रेजरी बॉन्ड बाजार में बेचता है। इससे रुपए की डिमांड बढ़ती है और गिरावट धीमी पड़ जाती है। इसे रूपी-डॉलर स्वैप कहा जाता है।
  • 2025-26 में RBI ने 53.1 अरब डॉलर बेचे, जो पिछले कारोबारी साल से करीब 12 अरब डॉलर ज्यादा थे। 21 मई 2026 को RBI ने कम से कम 2 अरब डॉलर और 26 मई को 5 अरब डॉलर बेचे।
  • प्रो. अरुण मानते हैं कि रुपए को कभी तेजी से नहीं गिरने देना चाहिए और इसके लिए RBI को दखल देना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होगा, तो बाजार के सट्टेबाज रुपए को और ज्यादा गिराएंगे। उत्पादन और निवेश घट जाएंगे। इससे अर्थव्यवस्था में हाहाकार मच जाएगा।
  • डॉ. कोहली के मुताबिक, RBI ने देखा कि रुपया 97 का आंकड़ा पार कर सकता है। इसे रोकने के लिए उसने डॉलर बेचे। क्योंकि साइकोलॉजिकल और पॉलिटिकल तौर पर रुपए का गिरना अच्छा नहीं माना जाता और ये मुद्दा बन सकता है। ऐसे में शायद RBI और डॉलर बेचें।
  • इसी के चलते RBI का विदेशी मुद्रा भंडार पिछले एक साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। 22 मई को जारी आंकड़ों के मुताबिक, RBI का विदेशी मुद्रा भंडार 681.4 अरब डॉलर पर आ गया है, जो पिछले हफ्ते 688.89 अरब डॉलर से ज्यादा था। हालांकि इतने भंडार से 10 महीने का खर्च चलाया जा सकता है।

क्या जल्द ही रूपया 100 का आंकड़ा छू सकता है?

  • 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष और अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया ने तो RBI को सलाह तक दे डाली कि रुपए को 100 तक गिरने दो। वे मानते हैं कि तेल की कमी अस्थायी हो या लंबे वक्त तक चले, रुपए का गिराना ही सबसे व्यवहारिक उपाय होगा। 100 सिर्फ एक नंबर है, जैसे 99 और 101 हैं।
  • डॉ. घोष कहती हैं कि रुपए को 100 तक गिरने देना अच्छी बात नहीं। क्योंकि इससे हमारे लिए कच्चे तेल, सोना और तमाम चीजों के दाम बढ़ जाएंगे। कुछ लोगों को लगता है कि रूपए के गिरने से भारत का एक्सपोर्ट बढ़ेगा। यह सोच पुरानी है। उन्हें समझना चाहिए कि भारत इम्पोर्ट ड्रिवन इकोनॉमी है, यानी हम समान बेचने से कहीं ज्यादा खरीदकर इस्तेमाल करते हैं। वहीं, RBI और सरकार को इसके लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
  • डॉ. कोहली मानते हैं कि रूपए का 100 तक पहुंचना इस पर निर्भर करता है कि तेल के दाम कहां रुकेंगे, भारत में क्या विदेशी निवेशक फिर से आएंगे, NRIs कितना मनी ऑर्डर भारत भेजेंगे और RBI रूपए को संभालने के लिए कब तक और कितना डॉलर बेंचेगा।
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