NATIONAL NEWS

बीकानेर का बढ़ा मान : अभय जैन ग्रन्थालय के निदेशक ऋषभ नाहटा का राष्ट्रीय मंच पर सम्मान

FacebookWhatsAppTelegramLinkedInXPrintCopy LinkGoogle TranslateGmailThreadsShare



बीकानेर। मरुधरा की सांस्कृतिक राजधानी बीकानेर के लिए आज अत्यंत गौरव का क्षण रहा, जब जयपुर में आयोजित श्रीमद्जगद्गुरु श्री रामानंदाचार्य जी के 825वें प्राकट्योत्सव के उपलक्ष्य में हो रहे 108 कुंडीय श्री राम महायज्ञ एवं ज्ञान भारतम् मिशन संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार व मंदिर श्री रघुनाथ ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में महंत श्री हरि शंकर दास जी महाराज वेदांती जी के द्वारा अखिल भारतीय मठ-पीठाधीश्वर समागम के भव्य समारोह में बीकानेर के प्रतिष्ठित अभय जैन ग्रन्थालय के निदेशक ऋषभ नाहटा का संत समाज द्वारा सम्मान किया गया।उन्हें दुर्लभ जैन, वैदिक एवं संत साहित्य की पांडुलिपियों के संरक्षण, सुव्यवस्थित संकलन तथा डिजिटाइजेशन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
यह भव्य आयोजन पूज्य स्वामी श्री राजेंद्र दास जी देवाचार्य के पावन सान्निध्य तथा जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्री रामकृष्ण आचार्य जी महाराज की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इस ऐतिहासिक अवसर पर देशभर से पधारे संत-महंतों, महामंडलेश्वरों एवं आचार्यगणों की उपस्थिति में 15 लाख से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण एवं डिजिटाइजेशन का संकल्प लिया गया।
कार्यक्रम के अंतर्गत संस्कृति मंत्रालय के “ज्ञान भारतम् मिशन” के साथ देश की 215 पांडुलिपि धारक संस्थाओं का ऐतिहासिक अनुबंध हुआ। इसी क्रम में बीकानेर के अभय जैन ग्रन्थालय द्वारा वर्षों से किए जा रहे पांडुलिपि संरक्षण कार्य को विशेष रूप से सराहा गया और उसके निदेशक ऋषभ नाहटा को अंगवस्त्र व सम्मान-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
संतों ने अपने आशीर्वचन में कहा कि बीकानेर जैसी धरती, जहाँ वीरता के साथ-साथ भक्ति और विद्या की परंपरा भी समृद्ध रही है, वहाँ के ग्रंथालयों और विद्वानों का यह दायित्व है कि वे प्राचीन संत साहित्य और शास्त्रों को सुरक्षित रखें। बीकानेर की इस सक्रिय भूमिका ने पूरे राजस्थान का मान बढ़ाया है।
इस अवसर पर बीकानेर से मोहित बिस्सा, लवकुमार देराश्री, लक्ष्मीकांत उपाध्याय एवं गौरव आचार्य भी उपस्थित रहे। सभी ने इस ऐतिहासिक ज्ञान-संरक्षण अभियान का समर्थन करते हुए बीकानेर की पांडुलिपि परंपरा को राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाने के संकल्प को दोहराया।
ज्ञातव्य है कि इस महायज्ञ के माध्यम से गो-संरक्षण, राष्ट्र-संरक्षण एवं शास्त्र-संरक्षण का व्यापक संकल्प लिया गया है। विशेष रूप से संत साहित्य के डिजिटाइजेशन द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर एक ई-पुस्तकालय निर्माण की योजना प्रस्तुत की गई, जिससे देशभर के संत-महात्माओं एवं शोधकर्ताओं को एक ही मंच पर समृद्ध साहित्य उपलब्ध हो सके।
बीकानेर के लिए यह उपलब्धि केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि उसकी ज्ञान परंपरा की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति है। मरुधरा की यह सांस्कृतिक विजय आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनेगी।

FacebookWhatsAppTelegramLinkedInXPrintCopy LinkGoogle TranslateGmailThreadsShare

About the author

THE INTERNAL NEWS

Add Comment

Click here to post a comment

error: Content is protected !!