
अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (AIDWA) राजस्थान की महासचिव डॉ. सीमा जैन ने कामकाजी महिलाओं के लिए मासिक धर्म अवकाश की मांग के संबंध में भारत के सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि न्यायालय की ओर से की गई नकारात्मक और भेदभावपूर्ण टिप्पणियां न केवल महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी वास्तविक आवश्यकताओं को नजरअंदाज करती हैं, बल्कि समाज में प्रचलित पितृसत्तात्मक सोच को भी मजबूती देती हैं।
डॉ. सीमा जैन ने कहा कि यह तर्क देना कि यदि मासिक धर्म अवकाश को कानूनी मान्यता दी जाती है तो महिलाएं नौकरी से वंचित हो सकती हैं, पूरी तरह से अनुचित और असंवेदनशील है। ऐसा तर्क महिलाओं को समान अवसर देने के बजाय उन्हें कार्यस्थलों से दूर करने की मानसिकता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक और समानतापूर्ण समाज में महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और अधिकारों को उद्योगों या कंपनियों की उत्पादकता के नाम पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि मासिक धर्म एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है और इस दौरान बड़ी संख्या में महिलाओं को दर्द, थकान, कमजोरी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे बिना किसी सुविधा या सहूलियत के लगातार काम करती रहें। यह स्थिति न केवल अमानवीय है बल्कि महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति समाज और संस्थानों की असंवेदनशीलता को भी उजागर करती है।
डॉ. सीमा जैन ने कहा कि मासिक धर्म अवकाश को कंपनियों के विकास के लिए खतरा बताना इस बात का संकेत है कि महिलाओं की स्वास्थ्य आवश्यकताओं को उत्पादन और मुनाफे के सामने गौण माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को उनकी इच्छा के अनुसार मासिक धर्म के दौरान अवकाश लेने का अधिकार देना वास्तव में यह स्वीकार करना है कि महिलाएं भी कार्यबल का समान और महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन उनकी कुछ विशिष्ट जैविक और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताएं हैं जिन्हें कार्यस्थलों पर उचित सुविधा के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं को नजरअंदाज किया जाएगा तो इससे महिलाओं को अनावश्यक पीड़ा और मानसिक तनाव झेलना पड़ेगा। इसके विपरीत यदि मासिक धर्म अवकाश जैसी व्यवस्था लागू की जाती है तो इससे महिलाओं के स्वास्थ्य, आत्मसम्मान और कार्यक्षमता तीनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। कई देशों और कुछ संस्थानों में इस तरह की व्यवस्थाएं पहले से लागू हैं और वहां यह साबित हुआ है कि इससे कार्यस्थलों पर महिलाओं की भागीदारी और उत्पादकता दोनों बेहतर होती हैं।
आज भी समाज में मासिक धर्म को लेकर अनेक तरह की वर्जनाएं और चुप्पी मौजूद है। इस विषय पर खुलकर चर्चा और नीतिगत पहल करना समय की मांग है। सरकार और नियोक्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा को ध्यान में रखते हुए संवेदनशील नीतियां बनाएं।
अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (AIDWA) राजस्थान की ओर से डॉ. सीमा जैन ने मांग की कि मासिक धर्म अवकाश को कामकाजी महिलाओं के अधिकारों का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए और केंद्र व राज्य सरकारें इस संबंध में स्पष्ट और प्रभावी कानून बनाएं। साथ ही सभी कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और स्वास्थ्य के अनुकूल कार्य वातावरण सुनिश्चित किया जाए।
महिलाओं के स्वास्थ्य और अधिकारों से जुड़े मुद्दों को नजरअंदाज करना न तो न्यायसंगत है और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह कामकाजी महिलाओं के हित में मासिक धर्म अवकाश की व्यवस्था को शीघ्र लागू करे।








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