ARTICLE - SOCIAL / POLITICAL / ECONOMICAL / EMPOWERMENT / LITERARY / CONTEMPORARY / BUSINESS / PARLIAMENTARY / CONSTITUTIONAL / ADMINISTRATIVE / LEGISLATIVE / CIVIC / MINISTERIAL / POLICY-MAKING

कितना भी कह लो , सुन लो स्त्री देह से आगे भी कुछ है, एक बार फिर, हमने देह के तराजू में तोल दिया स्त्री को..

TIN NETWORK
TIN NETWORK
FacebookWhatsAppTelegramLinkedInXPrintCopy LinkGoogle TranslateGmailThreadsShare

मुदिता पोपली


*बीकानेर की रणजीतपुरा की घटना ने फिर उठाए समाज, व्यवस्था और संवेदनशीलता पर कठोर प्रश्न*
बीकानेर के बज्जू में रणजीतपुरा गांव में नाबालिग छात्रा के साथ दुष्कर्म के बाद हुई निर्मम हत्या का मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज की आत्मा को झकझोर देने वाली त्रासदी बन गया है। आरोपी की गिरफ्तारी, प्रशासन और संघर्ष समिति के बीच बनी सहमति, पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार के साथ एक प्रक्रिया जरूर पूरी हुई है, लेकिन कई ऐसे सवाल पीछे छोड़ गई है जो आज भी हमारे सामाजिक तंत्र और सुरक्षा व्यवस्था के सामने खड़े हैं।
धरना समाप्त हुआ, आश्वासन मिले, सहायता राशि घोषित हुई — पर क्या यह सब उस पीड़ा को कम कर सकता है जो एक परिवार ने अपनी बेटी को खोकर महसूस की होगी? क्या यह समाज के उस डर को मिटा सकता है, जो हर माता-पिता के मन में अब और गहरा बैठता जा रहा है?
“जब रास्ते डराने लगें और शामें सवाल बन जाएं,
तब समझो समाज को अपने आईने से डर लगने लगा है।”
रणजीतपुरा की घटना ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ अपराध केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता और सुरक्षा ढांचे का संयुक्त संकट है। प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार किया और पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता तथा फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई का आश्वासन दिया, जिससे न्याय की प्रक्रिया को गति मिलने की उम्मीद जगी है।
लेकिन हर ऐसी घटना के बाद उठने वाला बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर अपराध होने के बाद की कार्रवाई से पहले अपराध को रोकने के उपाय क्यों कमजोर पड़ जाते हैं?
“हर मोमबत्ती की लौ में एक सवाल जलता है,
न्याय की राह क्यों हमेशा दर्द से होकर गुजरती है?”
देश और प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सुरक्षा का मुद्दा गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। सामाजिक बदलाव, डिजिटल दुनिया का प्रभाव, पारिवारिक संरचनाओं में परिवर्तन और कानून के प्रति डर का कम होना — कई ऐसे कारण हैं जो अपराध की प्रवृत्ति को प्रभावित कर रहे हैं।
क्योंकि केवल सख्त कानून बनाना पर्याप्त नहीं है; समाज में संवेदनशीलता, लैंगिक समानता की शिक्षा और सामुदायिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करना भी जरूरी है। जब तक मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक हर नई घटना केवल आंकड़ों में जुड़ती एक और संख्या बनकर रह जाएगी।
“बेटियां आंकड़े नहीं होतीं,
वे सपनों की किताब होती हैं — जिन्हें हम अधूरा छोड़ देते हैं।”
रणजीतपुरा की घटना के बाद जिस तरह सामाजिक संगठनों और आमजन ने आगे आकर आर्थिक सहयोग किया, वह समाज की संवेदनशीलता का सकारात्मक संकेत है। लेकिन सहायता राशि से ज्यादा जरूरी है सुरक्षा और सम्मान का वातावरण बनाना।
महिलाओं की सुरक्षा केवल पुलिस या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परिवार, शिक्षा प्रणाली, समुदाय और शासन — सभी की साझा जिम्मेदारी है। सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, संवेदनशील पुलिसिंग, तेज न्यायिक प्रक्रिया और सामाजिक जागरूकता — यह चार स्तंभ ही ऐसे मामलों को कम करने में प्रभावी साबित हो सकते हैं।
“जब तक हर घर की दहलीज पर भरोसा खड़ा नहीं होगा,
तब तक हर बेटी की मुस्कान अधूरी रहेगी।”
बज्जू की यह घटना समय के पन्नों में एक और दर्दनाक अध्याय बनकर दर्ज हो जाएगी, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हम इससे कुछ सीखेंगे? क्या यह घटना समाज को आत्ममंथन करने पर मजबूर करेगी? या फिर कुछ दिनों की चर्चा के बाद सब सामान्य हो जाएगा?
आज जरूरत केवल न्याय की नहीं, बल्कि उस सामाजिक बदलाव की है जहां बेटियां बिना डर के सपने देख सकें और परिवार बिना भय के उन्हें दुनिया में भेज सकें।
“न्याय तब पूरा होगा,
जब किसी मां की आंखों में डर नहीं — सिर्फ विश्वास होगा।”


FacebookWhatsAppTelegramLinkedInXPrintCopy LinkGoogle TranslateGmailThreadsShare
error: Content is protected !!