
रामायण की प्रासंगिकता बनी रहेगी- बलदेव भाई शर्मा
- रामायण का सांस्कृतिक और सभ्यतागत प्रभात विश्व के किसी भी महाकाव्य से ज़्यादा है
- इसका संदेश क्षेत्रीय और सांस्कृतिक सीमाओं से परे जाता है- श्रीनिवासराव
डिब्रूगढ़ 12 मार्च 2026। प्रभा खेतान फाउंडेशन ने ऑयल इंडिया लिमिटेड और डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर दो दिवसीय सांस्कृतिक और साहित्यिक महोत्सव “रामायण – एपिक ऑफ ऑल एपिक्स” का शुभारंभ किया। दो दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम का आयोजन डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय में किया जा रहा है। इस आयोजन का उद्देश्य विश्व के महानतम महाकाव्यों में से एक रामायण की शाश्वत विरासत और समकालीन प्रासंगिकता का उत्सव मनाना है।
इस महोत्सव में प्रतिष्ठित विद्वानों, लेखकों और सांस्कृतिक कर्मियों भाग ले रहे हैं. आयोजन में रामायण के साहित्यिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक आयामों पर चर्चा होगी । विचारोत्तेजक संवाद और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से इस महाकाव्य के साहित्य, प्रदर्शन कलाओं और समाज पर पड़े प्रभाव को उजागर किया जाएगा ।
कार्यक्रम का उद्घाटन हिंदी लेखक, प्रसिद्ध विद्वान , नेशनल बुक ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष प्रो. बलदेव भाई शर्मा ने किया । इस अवसर पर डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी के कुलपति जितेन हजारिका, जानी मानी लेखिका मंजरी मिश्रा, प्रोफेसर सत्यकाम बोर ठाकुर, प्रोफेसर जयंता कुमार बोरा, प्रोफेसर कराबी डेका हजारिका, जानीमानी असमिया कवियत्री और विदुषी ऑयल इंडिया लिमिटेड के प्रतिनिधि सुश्री अनिंदिता चटर्जी कार्यकारी न्यासी प्रभा खेतान फाउंडेशन,प्रभा खेतान फाउंडेशन के डॉ. के. श्रीनिवासराव समेत कई वरिष्ठ साहित्यकार, छात्र और मीडियाकर्मी मौजूद थे ।
इस मौके पर बलदेव भाई ने कहा कि आज के समय में भी रामायण की प्रासंगिकता बनी हुई है और आने वाले समय में भी बनी रहेगी । उन्होंने कहा कि हम सभी जानते हैं, रामायण का सांस्कृतिक और सभ्यतागत प्रभाव विश्व के किसी भी अन्य महाकाव्य की तुलना में अत्यंत व्यापक और गहरा रहा है। भारत ही नहीं, बल्कि पूर्वी, दक्षिणी और दक्षिण-पूर्व एशिया तक इसकी गूंज सुनाई देती है। राम और सीता की कथा के रूप में रामायण शाश्वत मूल्यों को अपने भीतर समेटे हुए है। एक पवित्र महाकाव्य होने से आगे बढ़कर इसने सामाजिक मूल्यों, नैतिक आदर्शों और सांस्कृतिक परंपराओं को आकार दिया है। इस प्रकार रामायण पूरी सभ्यता की सांस्कृतिक चेतना के केंद्र में स्थित है।
यह आश्चर्य की बात नहीं है कि रामायण ने शास्त्रीय नृत्य, रंगमंच, मूर्तिकला, मंदिर स्थापत्य और क्षेत्रीय साहित्य सहित अनेक कलात्मक अभिव्यक्तियों को प्रेरित किया है, और विभिन्न उत्सवों के माध्यम से इसे निरंतर मनाया जाता रहा है। इस प्रकार रामायण एक साथ ही कथा, ऐतिहासिक ग्रंथ, पवित्र महाकाव्य, सांस्कृतिक प्रकाशस्तंभ और दैनिक जीवन के लिए नैतिक मार्गदर्शक है। यह ऐसा धर्मग्रंथ नहीं है जिसे केवल मंदिर के गर्भगृह में रखकर पूजा जाए और जो जीवन से अलग हो, बल्कि यह एक जीवित चेतना की तरह है जो मनुष्यों के जीवन में निरंतर प्रवाहित होती रहती है।
विश्व में कोई भी अन्य महाकाव्य ऐसा नहीं है जिसकी लोगों के जीवन में उतनी गहरी उपस्थिति हो जितनी रामायण की है। कन्नड़, तमिल, तेलुगु, हिंदी, थाई और इंडोनेशियाई जैसी भाषाओं में इसके अनुवाद और पुनर्कथन इसके व्यापक प्रभाव को दर्शाते हैं। यह दिखाता है कि किस प्रकार रामायण ने विभिन्न सभ्यताओं में सांस्कृतिक पहचान, साझा कथाओं और नैतिक दर्शन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मैंने यहाँ केवल कुछ भाषाओं का उल्लेख किया है, परंतु भारत की अनेक भाषाओं में भी यही स्थिति है।
श्रीनिवास राव ने कहा कि यद्यपि इस महाकाव्य की रचना प्राचीन भारत में वाल्मीकि द्वारा हुई, फिर भी इसका संदेश क्षेत्रीय और सांस्कृतिक सीमाओं से परे जाता है। रामायण की सार्वभौमिकता इसके कालातीत विषयों और नैतिक मूल्यों में निहित है, जो विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और पीढ़ियों के लोगों को समान रूप से प्रभावित करते हैं। थाईलैंड, इंडोनेशिया और कंबोडिया जैसे देशों में भी रामायण के अनेक रूप देखने को मिलते हैं, जहाँ स्थानीय परंपराओं के अनुरूप कथा को अपनाया गया है, परंतु इसके मूल मूल्यों को सुरक्षित रखा गया है। क्योंकि यह अच्छाई और बुराई के संघर्ष, निष्ठा, पारिवारिक संबंधों और धर्म की खोज जैसे सार्वभौमिक मानवीय अनुभवों को अभिव्यक्त करता है, इसलिए रामायण आज भी विश्वभर में साहित्य, कला, रंगमंच और नैतिक चिंतन को प्रेरित करती रहती है।एक दार्शनिक ग्रंथ के रूप में रामायण कोई शुष्क दर्शन या केवल सैद्धांतिक विचार नहीं प्रस्तुत करती, बल्कि यह मानव जीवन में धर्म, सत्यनिष्ठा और निःस्वार्थता के महत्व को भी प्रतिपादित करती है.











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