
बीकानेर के राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित ‘पाण्डुलिपियों के अध्ययन में ए.आई. की उपयोगिता’ विषयक दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन रविवार को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वैश्विक उपयोग, संभावनाओं और उसकी सीमाओं पर विस्तृत चर्चा की गई।
कार्यक्रम में विभिन्न देशों और विश्वविद्यालयों से जुड़े विशेषज्ञों ने भाग लेते हुए बताया कि पांडुलिपियों, ऐतिहासिक अभिलेखों और भाषायी अध्ययन में एआई भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से आए प्रोफेसर्स तथा रूस से जुड़े विद्यार्थियों ने अपने विचार साझा करते हुए बताया कि विदेशों में एआई का उपयोग किस प्रकार शोध, डिजिटाइजेशन और भाषाई अध्ययन में तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि एआई तकनीक पांडुलिपियों के संरक्षण, अनुवाद और विश्लेषण को अधिक प्रभावी बना सकती है, लेकिन इसके उपयोग की एक सीमा भी तय होना आवश्यक है ताकि मानवीय अध्ययन की मौलिकता बनी रहे।
जेएनयू की प्रोफेसर डॉ. संदेशा रायपाल ने बताया कि आज एआई वैश्विक स्तर पर तेजी से विकसित हो रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को भी अपने स्वयं के कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित ऐप और तकनीकी प्लेटफॉर्म विकसित करने चाहिए, जिससे देश के डेटा का सुरक्षित और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया कि एआई का संतुलित उपयोग पांडुलिपियों के अध्ययन, सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण और नई पीढ़ी के शोध कार्यों के लिए नई संभावनाएं खोल सकता है। कार्यक्रम में ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से देश-विदेश के प्रतिभागी जुड़े।








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