
भाकृअनुप–केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीछवाल, बीकानेर में नाबार्ड द्वारा वित्त–पोषित परियोजना के अंतर्गत “कलम (ग्राफ्टिंग) के माध्यम से खेजड़ी ‘थार शोभा’ का वानस्पतिक प्रवर्धन” विषय पर 12 से 14 अगस्त] 2025 तक तीन दिवसीय ऑन–कैंपस उद्यमिता विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस प्रशिक्षण में बाड़मेर] ब्यावर] जैसलमेर] बीकानेर और नागौर जिलों से आए 15 प्रगतिशील किसान, बागवान एवं युवा उद्यमी शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्घाटन संस्थान के निदेशक डॉ. जगदीश राणे ने किया। उन्होंने शुष्क क्षेत्रों में खेजड़ी ‘थार शोभा’ के महत्व और किसानों की आय व रोजगार वृद्धि में इसकी भूमिका पर प्रकाश डाला। फसल उत्पादन विभाग के प्रमुख डॉ. धुरेंद्र सिंह ने किसानों को सलाह दी कि वे खेजड़ी व अन्य देशज फसलों को सूखा–सहिष्णु फल एवं सब्जी की फसलों के साथ एकीकृत कर कृषि उत्पादन में विविधता लाएं। परियोजना प्रमुख डॉ. डी.के. सरोलिया ने प्रशिक्षुओं से आग्रह किया कि वे कलिकायन विधि अपनाकर देशी खेजड़ी पौधों को उन्नत ‘थार शोभा’ वृक्षों में परिवर्तित करें।
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों ने बीजू पौधों की तैयारी, मातृ वृक्ष का रखरखाव, उचित अवस्था में कली (आँख) प्राप्त करना एवं कलमी पौधे तैयार करने की तकनीक का अभ्यास किया।
कार्यक्रम में निर्धारित मानदंडों के आधार पर तीन सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षुओं— श्री सुशील बिश्नोई (फूलदेसर] लूणकरणसर] बीकानेर)] श्री छोगाराम (बांटा] बाड़मेर) तथा श्री जगदीश (मोहराई] ब्यावर) को मुख्य अतिथि डॉ. एल.के. कपिल (इंचार्ज] ट्रोमा सेंटर] ihch,e] बीकानेर) द्वारा fdlkuksa dks प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। इस अवसर पर श्री रमेश ताम्बिया जिला विकास प्रबंधक, नाबार्ड ने किसानों को नाबार्ड की किसान–हितैषी योजनाओं की जानकारी दी और बताया कि जो किसान समूह बनाकर खेजड़ी ‘थार शोभा’ की नर्सरी व सांगरी उत्पादन को उद्यम के रूप में अपनाना चाहते हैं] उन्हें राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत वित्तीय सहायता दी जा सकती है। श्री मेघ सिंह राजपुरोहित (किसनासर, नोखा] बीकानेर) और श्री मुकेश कुमार पारीक (चक–5, के.एच.एम.) के प्रयासों की सराहना करते हुए अन्य किसानों को भी इस दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित किया गया।
संस्थान के विशेषज्ञ वैज्ञानिक— डॉ. आर.के. मीणा (मूलवंत प्रवर्धन) डॉ. पवन सिंह गुर्जर (खेजड़ी रोपण प्रारूप व मातृ पौध देखभाल) डॉ. लालचंद (सही अवस्था में कलिकाओं का चयन) डॉ. के.एल. कुमायत्त (कलिकायन की विधियों पर वैज्ञानिक पहलू) ने फार्म परिचर्चा के माध्यम से अपना ज्ञान साझा किया। प्रशिक्षण में डॉ. एस.आर. मीना और श्री रूपचंद बलाई का भी विशेष योगदान रहा।










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