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कविता कभी भी पूर्ण नहीं होती : प्रोफेसर अर्जुनदेव चारण

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काव्य-संग्रह ‘ मुळकै है कविता ‘ का भव्य लोकार्पण

जोधपुर । अपूर्णता कविता का स्वभाव है । किसी उपन्यास, कहानी, नाटक या अन्य किसी गद्यविद्या की तरह कविता कभी भी पूर्ण नहीं होती मगर कवि यह जानता है कि कविता में अपनी बात को पूर्ण कैसे किया जाता है । यह विचार ख्यातनाम कवि-आलोचक प्रोफेसर (डाॅ.) अर्जुनदेव चारण ने गायत्री प्रकाशन द्वारा होटल चन्द्रा इन में आयोजित राजस्थान काव्य संग्रह ‘ मुळकती है कविता ‘ के लोकार्पण समारोह में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में व्यक्त किए। प्रोफेसर चारण ने भारतीय ज्ञान परम्परा के अंतर्गत आधुनिक दृष्टि से कविता की विशद् व्याख्या करते हुए कवि प्रकाशदान चारण की कविता में मुळक के मार्फत जो छुपाने की कला का भाव है उसे विश्व कविता का भाव बताया।

समारोह संयोजक हरीश बी.शर्मा ने बताया कि इस अवसर पर प्रतिष्ठित कवि-कथाकार एवं नाट्य निर्देशक मधु आचार्य आशावादी ने मुख्य अतिथि के रूप में अपने उद्बोधन में मुळकै है कविता में शिल्प के स्तर पर किए प्रयोगों की सराहना करते हुए कहा कि कवि प्रकाशदान चारण अपनी कविताओं में शब्द के स्तर पर सजग तथा भाव के स्तर पर एक्टिविस्ट की तरह पाठक के मन पर गहरी छाप छोड़ते हैं। आशावादी ने ‘ मुळकै है कविता ‘ के कुछ अंश सुनाते हुए कविताओं में छिपे गहरे व्यंग्य को उजागर करते हुए इसे विद्रोह की कविता बताया । राजस्थानी के प्रतिष्ठित कवि-आलोचक डॉ.गजेसिंह राजपुरोहित ने अपने विशिष्ट उद्बोधन में कहा कि मुळकै है कविता संग्रह में कविता की नई दीठ के साथ कवि में रचनात्मक क्षमता की असीम संभावनाएं नजर आती है । उन्होंने कहा कि ‘ मुळकै है कविता ‘ संग्रह मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण समकालीन राजस्थानी कविता की सशक्त साख है। युवा रचनाकार डाॅ.रामरतन लटियाल ने लोकार्पित पुस्तक की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए अपने आलोचनात्मक पत्र में विशद विवेचना करते हुए कहा कि प्रकाशदान चारण की कविताएं जीवन की विविध अनुभूतियों की इन्द्रधनुषी छटा के साथ भाव, भाषा एवं काव्यशैली की दृष्टि से पाठक के मन- मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ती है । इस अवसर पर कवि प्रकाशदान चारण ने कविता की रचना प्रक्रिया के अनुभव साझा करते हुए कहा कि मेरे लिए कविता लिखना चुनौती की तरह होता है जहाँ भाषा की सृजनात्मकता को बचाए रखते हुए पाठक तक पहुँचना होता है।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्ज्वलित किया गया। तत्पश्चात साहित्यकार हरीश बी.शर्मा ने स्वागत उदबोधन दिया। संचालन डाॅ.कालूराम परिहार ने किया । प्रोफेसर अरुण कुमार व्यास ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित किया।

इस अवसर पर प्रतिष्ठित रचनाकार प्रोफेसर सत्यनारायण, प्रोफेसर सोहनदान चारण, डाॅ.चांदकौर जोशी, प्रोफेसर अरूण कुमार व्यास, श्रीमती बसंती पंवार, मोहनसिंह रतनू , माधव राठौड़, श्रीमती संतोष चौधरी, खेमकरण लाळस, विजयसिंह कविया, सत्यदेव कविया, इंजीनियर कुसुम लता,
डॉ. पूनम कालश,डॉ. प्रवीण, कमलेश शर्मा, राजवीर सिंह , रणवीरसिंह, गंगादान, लालसिंह, पृथ्वीसिंह, डाॅ.सुखदेव राव, डाॅ. अमित गहलोत, डाॅ.कप्तान बोरावड़, डाॅ.जितेन्द्रसिंह साठिका, महेन्द्रसिंह छायण, डाॅ.सवाई सिंह महिया, श्रवणराम भादू , अभी पंडित, शांतिलाल, विष्णुशंकर, मगराज, जगदीश मेघवाल, रामकिशोर फिड़ोदा, चन्द्रभान बिश्नोई, डाॅ.मनोजसिंह, डाॅ.भींवसिंह राठौड़, दिलीप राव, गौतम गुटस सहित अनेक प्रतिष्ठित रचनाकार, शिक्षक, शोध-छात्र एवं साहित्य प्रेमी मौजूद रहे।

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