“”चिट्ठी”” : By सीमा मौर्या ‘शैली

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मां तुम फिर से चिट्ठी बोलो ना
मैं तुम्हारे शब्दों को लिखती जाऊं
तुम्हारे मन के भावों को उतारती जाऊं
याद है मुझे पापा की पोस्टिंग
आसाम में हुआ करती थी
तुम बोलती थी मैं लिखती थी
नहीं पता सही लिखती थी
या गलत
लेकिन इतना पता है
जब मेरी चिट्ठी पापा के हाथ में
पहुंचती थी मेरे उन टूटे फूटे शब्दों को पापा कितनी शिद्दत से पढ़ा करते थे और मुस्कुरा कर मुझे जवाब दिया करते थे
मैं अपने नन्हे नन्हे हाथों से
नन्हें-नन्हें शब्दों से
एक माला की तरह पिरो कर
तुम्हारी भावनाओं को
उन तक पहुंचाती थी
शब्द तुम्हारे होते थे
कलम मेरी होती थी
याद आते हैं वह पल
पापा 2 साल बाद कभी डेढ़ साल बाद घर आते थे
पता है ना फौज की नौकरी
ऐसी ही होती थी मैं आपकी चिट्ठी का कितना इंतजार करती थी
कितने मन से चिट्ठी का जवाब लिखा करती थी
पूरे घर की बातें आप तक पहुंचा कर कितना खुश होती थी
और जब पापा की चिट्ठी आती थी
कितनी शिद्दत से पढ़ती थी
भले ही मुझे पढ़ना ना आए लेकिन कोशिश तो पूरी करती थी
याद आते हैं वो पल तो मन कितना उल्लास से भर उठता है
यही तो वो यादें हैं जो मुस्कुराने पर मजबूर कर देती हैं कितनी मीठी यादें जुड़ी है उस छोटे से अंतर्देशीय खत से
जो अब ढूंढने से नहीं मिलती है इतना इंतजार होता था पोस्टमैन का
जब मम्मी अक्सर पूछती थी पुजारी जी कोई ड्राफ्ट या चिट्ठी आई है वह हंसकर जवाब देते थे
हां भैया की चिट्ठी आई है चिट्ठी का नाम सुनते ही सबसे ज्यादा मैं खुश होती थी
आखिर चिट्ठी पढ़ती तो मैं ही थी ,,,

सीमा मौर्या ‘शैली
बरेली
उत्तर प्रदेश

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