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डॉ. तैस्सितोरी की राजस्थान की मरूधरा एवं मरूवाणी की संस्कृति एवं साहित्य के प्रति असीम अनुरक्ति थी : पुरोहित

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पल्लू गांव की दसवीं-ग्यारवी शताब्दी के दौरान सरस्वती प्रतिमा को तलाशने का श्रेय भी डॉ. तैस्सितोरी को ही जाता है :: जोशी

बीकानेर। सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट , बीकानेर के तत्वावधान में इटली मूल के राजस्थानी विद्वान डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी की 104वीं पुण्यतिथि पर बुधवार को स्थानीय म्यूजियम परिसर स्थित डॉ. तैस्सितोरी की प्रतिमा पर पुष्पांजली ,उनके व्यक्तित्व एवं कृत्तिव्व पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के कोषाध्यक्ष, कवि-कथाकार राजेन्द्र जोशी ने की तथा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डूँगर महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ. राजेन्द्र पुरोहित थे एवं कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ संस्कृृतिकर्मी एन. डी. रंगा  एवं व्यंगकार-सम्पादक डॉ. अजय जोशी रहे।
कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों , सामाजिक कार्यकर्ताओं , शिक्षाविदों, साहित्यकारों एवं शोधार्थियों ने डॉ. तैस्सितोरी की मूर्ति पर माल्यार्पण किया ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राजेन्द्र जोशी ने कहा कि इटली निवासी राजस्थानी भाषा के  विद्वान डॉ. तैस्सितोरी बीकानेर में रहते हुए राजस्थान के इतिहास , संस्कृति , साहित्य तथा पुरातत्व संबंधी शोध कार्य में तत्पर रहे । जोशी ने कहा कि उन्होनें यहां के ऐतिहासिक साहित्य हस्तलिखित ग्रन्थ , शिलालेख एवं जैन साहित्य को एक सूत्र में पिरोकर साहित्य मर्मज्ञों के लिए प्रस्तुत किया ।

जोशी ने कहा कि डॉ. तैस्सितोरी राजस्थानी लोकगीतों के प्रेमी थे, वे मूमल , मरवण , पद्मिनी आदि कथाऐं और गीत सुनते और रातभर गांवों में रहकर वहां की भाषा और संस्कृति का अध्ययन करते रहे । जोशी ने कहा कि पल्लू गांव की दसवीं-ग्यारवी शताब्दी के दौरान सरस्वती प्रतिमा ( 10वी -11वीं शती ) को तलाशने का श्रेय भी डॉ. तैस्सितोरी को ही जाता है ।
मुख्य अतिथि डाॅ. पुरोहित ने कहा कि डॉ. तैस्सितोरी की राजस्थान की मरूधरा एवं मरूवाणी की संस्कृति एवं साहित्य के प्रति असीम अनुरक्ति थी, यही कारण है कि वे शनैः-शनैः यही के होकर रह गये । पुरोहित ने कहा कि डूंगर महाविद्यालय जनवरी माह में डाॅ. तैस्सितोरी के कृतित्व पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया जायेगा।
कार्यक्रम में कवि-आलोचक डाॅ. नीरज दइया ने कहा कि बीकानेर के भ्रमण और यहां के इतिहास से प्रेरित हुए ऐसे में बीकानेर की माटी से प्रेरणा लेकर डॉ. तैस्सितोरी ने राजस्थानी भाषा के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया ।
इस अवसर पर विशिष्ठ अतिथि एन.डी.रंगा एवं डाॅ.अजय जोशी ने कहा कि अब समय आ गया है , जब राजस्थानी भाषा को मान्यता मिल जानी चाहिए । कवि- संस्कृतिकर्मी चन्द्रशेखर जोशी ने कहा कि उदीने एवं बीकानेर को जुड़वां शहर के रूप में स्थापित करने के लिए नगर निगम एवं नगर के साहित्यकारों एवं कला साहित्य एवं संस्कृति जगत के लोगो को प्रयास करने की जरूरत है ।
राजस्थान राज्य प्राच्य संग्रहालय के शोध अधिकारी डाॅ. नितिन गोयल ने कहा कि शोधार्थियों को डॉ. तैस्सितोरी के शोध कार्य का अध्ययन करना चाहिए और उनके द्वारा किए गये शोध से अपने द्वारा किये जाने वाले शोध को गुणवत्तायुक्त बनाया जा सकता है । गोयल ने कहा कि डॉ. तैस्सितोरी भाषा के प्रति जुड़ाव के प्रेरणा स्त्रोत के रूप में याद किए जाएगें ।
एडवोकेट महेंद्र जैन ने कहा कि इटली निवासी डॉ. तैस्सितोरी राजस्थानी संगीत के भी प्रेमी थे ।
कार्यक्रम संयोजक साहित्यकार राजाराम स्वर्णकार ने संस्था की गतिविधियों का परिचय देते हुए डाॅ. तैस्सितोरी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में शोधार्थी डाॅ. नमामी शंकर आचार्य, संस्कृृतिकर्मी डाॅ. मोहम्मद फारुख चौहान, अब्दुल शकूर सिसोदिया, वरिष्ठ कवि जुगल पुरोहित, डाॅ. एम.एल.जागिंड, चैनई निवासी राहुल शर्मा, पुस्तकालय अधीक्षक विमल शर्मा, प्रेमप्रकाश मण्डोरा, सुंदरलाल भजूड़, प्रेमरतन सोनी सहित अनेक महानुभावों ने पुष्पाजंली की।
आभार संस्कृतिकर्मी प्रेमनारायण व्यास ने ज्ञापित किया।

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