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बंगाल पर चढा महाराष्ट्र का जादू,सैकड़ों आदिवासी महिलाओं को बांबू के गुर सीखा रही मिनाक्षी

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जयपुर।अब तक देश ने पूर्वोत्तर राज्य से बांस का पाठ सीखा, लेकिन अब महाराष्ट्र सीधे पश्चिम बंगाल के सुदूर आदिवासी अंचलों में पहुंचकर महाराष्ट्र की विख्यात बांस शिल्पी बांबु के गुर सीखा रही है. मीनाक्षी मुकेश वालके, जिन्हें “द बांबु लेडी ऑफ महाराष्ट्र” के नाम से जाना जाता है, कोलकाता के एक दूरस्थ आदिवासी क्षेत्र बीरभूम पहुंच गई हैं. मीनाक्षी, जो अपनी बांस की राखी के लिए विश्व स्तर पर लोकप्रिय हो गई हैं, बीरभूम की महिलाओं को बांस की कई कलाकृतियों के अलावा राखी बनाना सिखा रही हैं. यह प्रशिक्षण शुक्रवार 13 जनवरी से शुरू हो गया है. नवपारा लक्ष्मीनारायण खादी एवं ग्रामोन्नयन महिला संस्था की कार्यकारी निदेशक झुमा चैटर्जी ने बताया कि बीरभूम की महिलाएं पिछले कई दिनों से मीनाक्षी का बेसब्री से इंतजार कर रही थीं. मीनाक्षी वालके बांस प्रशिक्षण देने के लिए बंगाल के सबसे दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों की यात्रा करनेवाली महाराष्ट्र राज्य की पहली बांस शिल्पी है. बिरभुम मे मीनाक्षी 360 महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाएंगी. इससे पहले, उन्होंने गढ़चिरौली के नक्सल प्रभावित सुदूर इलाकों के 25 युवक-युवतियों को आवासीय प्रशिक्षण, नाबार्ड और उमेद के प्रकल्प अधीनस्थ एमआईटी के माध्यम से औरंगाबाद और जालना में प्रशिक्षण और पालघर की वारली आदिवासी महिलाओं को भी पढ़ाया था. गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘मन की बात’ में पालघर का जिक्र किया था और अपने ट्विटर पोस्ट में मीनाक्षी की तस्वीर साझा की थी. मीनाक्षी आदिवासी और वंचित महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और संपूर्ण ग्रामीण आजीविका विकसित करने के उद्देश्य से बांबू के जरिये पिछले पांच वर्षों से सेवा कर रही हैं. उनका महिला सशक्तिकरण गृह उद्योग “अभिसार इनोवेटिव्स” निर्यात करने की क्षमता तक विस्तारित हुआ है. तीन सदस्यो के परिवार में अपने 6 साल के बेटे की देखभाल करते हुए मीनाक्षी बीते 5 वर्षो से यह सामाजिक कार्य कर रही है. और अब तक वह 5 जिलों में 250 से अधिक महिलाओं को कौशल प्रदान कर चुकी हैं. कनाडा का “वुमन हीरो” पुरस्कार पानेवाली मीनाक्षी ने ओलंपिक पदक विजेता राही सरनोबत, तेजस्विनी सावंत और अभिनेता सिद्धार्थ जाधव के साथ कुछ प्रतिष्ठित पुरस्कार जीते हैं. बीरभूम पश्चिम बंगाल राज्य में एक भारी वन जनजातीय क्षेत्र है. इस स्थान पर बड़ी संख्या में आदिवासी रहते हैं. मीनाक्षी को स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता झूमा चैटर्जी ने बांस के काम से वित्त-सक्षम कौशल सिखाने के लिए राजी किया था. मीनाक्षी की बंबू राखियां भारत और विदेशों में एक लोकप्रिय ब्रांड है. मीनाक्षी फिलहाल वहां की महिलाओं को यह हुनर ​​​​सिखा रही हैं. झूमा चैटर्जी ने बताया कि इस क्षेत्र की लगभग 360 महिलाओं को इससे लाभ होगा. *अद्भुत और प्रसन्नता* इतनी प्रसिद्ध महिला का महाराष्ट्र से पहली बार बिरभुम आना और उनसे सीखने की खुशी वहा की महिलाओ के चेहरे पर झलक रही थी. मीनाक्षी को “आदिवासियों की बांबू क्वीन” के रूप में भी जाना जाता है, इसलिए मीनाक्षी वालके का उनके पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया. यह प्रशिक्षण पन्द्रह दिनों तक चलेगा *व्यवस्था भंग और गरीबी उन्मूलन*बाँस क्षेत्र में वर्तमान कार्य अधिकांश पुरुष प्रधान है. उसे छेदकर मीनाक्षी ने अपना हूनर दिखाया. बेहद गरीबी में फंसी मीनाक्षी ने अपने परिवार को इसी से संवारा. एमपीएससी परीक्षा मे प्रश्न, जीवन संघर्षों पर बायोपिक, केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय से बधाई, विदेशों में पढ़ाने के लिए निमंत्रण और पुरस्कार, देश का पहला बांस क्यूआर कोड स्कैनर मॉडल 5 वर्षों में मीनाक्षी की यह कुछ उपलब्धियां रही हैं. उनके शिविर अरुणाचल प्रदेश, झारखंड, गुजरात और छत्तीसगढ़ में भी आयोजित किए गए हैं.

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