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भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ सूर्य के वायुमंडल से एक विस्फोट के चुंबकीय क्षेत्र का मापन

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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्राल

रेडियो अवलोकनों के इस्‍तेमाल से चुंबकीय क्षेत्र का अनुमान लगाकर वैज्ञानिक सूर्य में झांकते हैं
भारतीय वैज्ञानिकों ने, अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ, सूर्य के वायुमंडल से एक विस्फोट के चुंबकीय क्षेत्र को मापा है (पहली बार विस्फोटित प्लाज्मा से जुड़े कमजोर थर्मल रेडियो उत्सर्जन को देखकर), जिससेसूर्य के आतंरिक हिस्‍से का एक दुर्लभ झलक दिखता है। सूर्य के वातावरण या सौर परिमंडल में होने वाली घटना का अध्ययन सूर्य के आंतरिक कार्यप्रणाली की जानकारी प्रदान करता है।

सूर्य एक अत्यंत सक्रिय पिंड है, जो कई विस्‍फोटक घटनाओं में भारी मात्रा में गैस को बाहर निकालती है और परिमंडल को बहुत उच्च तापमान, मजबूत चुंबकीय क्षेत्र बनाती है। कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) ऐसे विस्फोटों की एक श्रेणी है। सीएमई हमारे सौरमंडल में होने वाले सबसे शक्तिशाली विस्फोट हैं। जब वास्तव में एक मजबूत सीएमई पृथ्वी से आगे बढ़ता है, तो यह हमारे उपग्रहों में इलेक्ट्रॉनिक्स को नुकसान पहुंचा सकता है और पृथ्वी पर रेडियो संचार नेटवर्क को बाधित कर सकता है। इसलिए, खगोलविद नियमित रूप से इन घटनाओं का अध्ययन करते हैं। अनुसंधान का यह क्षेत्र अंतरिक्ष के मौसम को समझने में मदद करता है।

भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी)केएक स्वायत्त संस्थान, भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (आईआईए) के वैज्ञानिकों की एक टीम ने अपने सहयोगियों के साथ चुंबकीय क्षेत्र और अन्य को मापने के लिए अपने रेडियो दूरबीनों से डेटा का इस्‍तेमाल किया। 01 मई, 2016 को एक सीएमई में प्लाज्मा की भौतिक स्थितियों का पता चला। यह कर्नाटक के गौरीबिदनूर में आईआईए के रेडियो दूरबीनों की मदद से पाया गया, साथ ही कुछ अंतरिक्ष-आधारित दूरबीनों ने सूर्य को अत्यधिक पराबैंगनी और सफेद रोशनी में देखा,जब इसकी गतिविधि का आधार सूर्य के दृश्य हिस्‍से के ठीक पीछे था। इसने अनुसंधानकर्ताओं को सीएमई में निकाले गई गैस की मात्रा से थर्मल (या ब्लैकबॉडी) विकिरण नामक एक बहुत कमजोर रेडियो उत्सर्जन का पता लगाने का मौका दिया। वे इस उत्सर्जन के ध्रुवीकरण को मापने में भी सक्षम थे, जो उस दिशा का संकेत है, जिसमें तरंगों के विद्युत और चुंबकीय घटक दोलन करते हैं। इस डेटा का उपयोग करते हुए, उन्होंने तब निकाले गए प्लाज्मा के भौतिक गुणों की भी गणना की। आर. रमेश, ए. कुमारी, सी. कथिरावन, डी. केतकीऔर टी.जे. वांग के अध्ययन के परिणाम प्रमुख अंतरराष्ट्रीय जर्नल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित हुए हैं।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (आईआईए), बैंगलोर में प्रोफेसर और पेपर के मुख्य लेखक आर. रमेश का कहना है, ‘‘हालांकि सीएमई सूर्य पर कहीं भी हो सकते हैं, यह मुख्य रूप से वे हैं जो दृश्यमान सौर सतह (फोटोस्फीयर कहा जाता है) के केंद्र के पास के क्षेत्रों से उत्पन्न होते हैं, जैसा कि हमने अध्ययन किया है जो हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे सीधे पृथ्वी की ओर फैल सकते हैं।”एक सह-लेखिका ए. कुमारी ने कहा, “इन सीएमई का आमतौर पर दृश्य प्रकाश में अध्ययन किया जाता है, लेकिन सूर्य के इतने अधिक चमकीले होने के कारण, हम इन सीएमई का तभी पता लगा सकते हैं और उनका पीछा तभी कर सकते हैं, जब उसने सूर्य की सतह से काफी दूरी तक पहुंचे हों। हालांकि, थर्मल उत्सर्जन के रेडियो अवलोकन, हमारे अध्ययन की तरह, हमें सतह से ही सीएमई का अध्ययन करने की सुविधा देता है।”

अध्ययन के एक अन्य सह-लेखक सी. कथिरावन का कहना है,”सीएमई के स्रोत क्षेत्र को जानना, संबंधित चुंबकीय क्षेत्रऔर उनके किनेमेटिक्स क्षेत्र में या तो सौर सतह से ऊपर या उसके हिस्‍से से सात लाख किलोमीटर तक, सीएमई की विशेषताओं को समग्र रूप से पूरी तरह से समझने में महत्वपूर्ण हैं।’’

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