म्हाराे डूबताे बीकाणाे…:निगम का सिस्टम फेल; ड्रेनेज-नालों की सफाई नहीं, क्योंकि बंद कर रखे







उसने बारिश में भी खिड़की खोल के देखा नहीं
भीगने वालों को कल क्या क्या परेशानी हुई…
जमाल एहसानी की इन लाइनें मानों शुक्रवार शाम बीकानेर के लोगों की परेशानी को देखकर ही लिखी गई हों। शुक्रवार को सिर्फ 22.2 मिलीमीटर बारिश ने शहर के पूरे सिस्टम की परतें खोल दी। शाम छ: बजे हुई बारिश का पानी सुबह तक कई जगहाें से नहीं निकला। जहां से निकला वहां दलदल बना गया। संभागीय आयुक्त और कलेक्टर एक साल से शहर के जिन इलाकों को ऊपरी आवरण से खूबसूूरत बना रहे थे वहां भी घुटनों तक पानी था।
भास्कर ने शहर की इस दुर्दशा की समीक्षा की तो तीन प्रमुख वजह निकलकर आई लेकिन समस्या ये है कि जो वजह शहरवासियों को समझ आ रही वो ना तो जिले के तीनों मंत्रियों को आ रही और निगम कमिश्नर, कलेक्टर और संभागीय आयुक्त काे नहीं आ रही। तीनों मंत्रियों के इसी शहर में मकान हैं। मंत्री डॉ.बी.डी.कल्ला, मंत्री भंवरसिंह भाटी, गाेविंद राम मेघवाल में से डाॅ. कल्ला तो शहर के विधायक हैं। उनकाे ही इतने साल में शहर के ड्रेनेज की चिंता नहीं हुई ताे भंवरसिंह और गाेविंदराम ताे ग्रामीण क्षेत्र के विधायक हैं। बीकानेर पूर्व की विधायक सिद्धि कुमारी काे ड्रेनेज से ज्यादा सूरसागर की दीवार की चिंता है। सुमित गाेदारा भी शहर में रहते हैं मगर कोई भी इस मुद्दे को नहीं उठाता।
नालों के जाम रहने की तीन वजह…नागरिक बात करते हैं, जिम्मेदार नहीं
1- ठेके की बजाय निगम से नालाें की सफाई
जयपुर, जाेधपुर और काेटा के सभी दाे-दाे निगम, अजमेर समेत ज्यादातर जगह आज भी ठेके पर शहर के नालाें की सफाई हाेती है। काेटा में 40-40 लाख, अजमेर में 42 लाख रुपए के नाला सफाई टेंडर हुए। आज के 10 साल पहले तक बीकानेर में भी यही व्यवस्था थी। जब तक ये व्यवस्था थी तब बीकानेर में 22 मिलीमीटर में कभी शहर नहीं डूबा। निगम के पास चार खुद की और चार ठेकेदार की जेसीबी हैं।
2. नाले पाट दिए, सफाई के लिए काेई सिस्टम नहीं छाेड़ा
लोग नालों में गिरकर जख्मी न हों, मरें नहीं इसलिए निगम ने नाले बंद करा दिए। लंबी लंबी आरसीसी की ढलाई करा दी गई। नाले साफ कैसे होंगे इस पर विचार ही नहीं किया गया। नालों की सफाई को जेसीबी चल ही नहीं सकती सिर्फ खाना पूर्ति की जाती है। नतीजा शुक्रवार की बारिश में सभी ने देखा। नगर निगम के ठीक पीछे और गिन्नाणी के माताजी मंदिर के पास। नाला इतना बुरा जाम है कि जाली के ऊपर से पानी निकलता है।
3. शहर में ड्रेनेज सिस्टम नहीं है, 55 से 60 करोड़ चाहिए
शहर में ड्रेनेज नाम की काेई चीज नहीं। यूआईटी ने जाे नई काॅलाेनी बसाई वहां भी प्लान नहीं। नगर निगम पर लगातार ड्रेनेज सिस्टम डवलप करने का दबाव है। पूरे शहर का ड्रेनेज सिस्टम ठीक करने के लिए 55 से 60 कराेड़ की जरूरत है। अमृत-2 और स्वच्छ भारत मिशन से ये राशि मिल सकती है। शहर काे जितनी जरूरत सीवरेज की है उससे ज्यादा ड्रेनेज की है। तीन साल में 13 आयुक्त बदले लेकिन किसी ने इस पर नहीं साेचा।
कमिश्नर-कलेक्टर और आयुक्त से 1 सवाल
आखिर कब तक बारिश में डूबता रहेगा शहर?
शहर में नालाें पर कब्जे हैं। लोगों ने पानी के बहाव के रास्ते बंद कर दिए हैं। मेरी हिदायत है वे खुद कब्जे हटा लें वरना हम हटाएंगे। नीरज के पवन, कमिश्नर
बारिश के पानी का स्थायी समाधान ड्रेनज सिस्टम डवलप करने पर ही होगा। करीब 900 कराेड़ा का बजट चाहिए। उसी का संकट है। भगवती प्रसाद कलाल, कलेक्टर
गिन्नाणी के आसपास पूरे शहर का पानी भरता है। हमने प्राेजेक्ट तैयार कराया है। उसे आरयूआईडीपी वाले नाले में डालना हाेगा। 8 कराेड़ का खर्चा है। केसरलाल मीणा, निगम आयुक्त







