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ऊँट पालक सीमित संसाधनों से उष्‍ट्र दुग्‍ध व्‍यवसाय को शुरू करें : डॉ. मेहता

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ऊँट पालकों ने कहा, ‘प्रशिक्षण में उष्‍ट्र दुग्‍ध उत्‍पाद से लेकर ऊँट की मींगणी तक के उपयोग को सीखा’

बीकानेर, 29 अगस्त। भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र (एनआरसीसी), बीकानेर में आज दिनांक को पशु अनुवांशिक संसाधनों पर नेटवर्क परियोजना के अंतर्गत ‘दुधारू ऊँटों का प्रबंधन और ऊँट डेयरी में उद्यमिता विकास’ विषयक पाँच दिवसीय प्रशिक्षण (25–29 अगस्त, 2025) का समापन किया गया । इस प्रशिक्षण में राजस्थान के चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, उदयपुर और मध्यप्रदेश के मंदसौर, नीमच जिलों के ऊँट पालकों ने भाग लिया।

समापन समारोह के मुख्‍य अतिथि डॉ. एस.सी. मेहता, विभागाध्‍यक्ष, भाकृअनुप-राष्‍ट्रीय अश्‍व अनुसंधान केन्‍द्र, बीकानेर ने कहा कि ऊँट पालक, ऊँट डेयरी में उद्यमिता विकास हेतु छोटे व सीमित संसाधन, जैसे दूध पैकेजिंग की छोटी मशीन, डीप फ्रीज़ और थर्मोकॉल पैकिंग तथा डिजीटल प्‍लेटफार्म आदि के माध्‍यम से इस व्‍यवसाय को प्रारम्‍भ कर लाभ कमा सकते हैं। उन्होंने बताया कि ऊँटनी के दूध में विद्यमान औषधीय गुणधर्मों तथा विभिन्‍न मानव रोगों यथा- मधुमेह, टी.बी. और ऑटिज़्म आदि के प्रबंधन में इसके महत्‍व को देखते हुए यह (दूध) उपभोक्‍ताओं को सुलभ करवाया जाना चाहिए। डॉ. मेहता ने बीमार पशुओं को अलग रखने, रोटेशनल चराई पद्धति अपनाने तथा पशु संबंधी समस्‍या के निराकरण हेतु विषय-विशेषज्ञों की सलाह लेने आदि वैज्ञानिक पद्धति से प्रबंधन हेतु प्रोत्‍साहित किया।

इस अवसर पर केन्‍द्र के निदेशक एवं कार्यक्रम अध्‍यक्ष डॉ. अनिल कुमार पूनिया ने आशा जताई कि एनआरसीसी द्वारा ऊँट पालकों को दिए गए इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्‍यम से ऊँट डेयरी उद्यमिता विकास के विभिन्‍न आयामों संबंधी प्रदत्‍त उपयोगी जानकारी व व्‍यावहारिक प्रशिक्षण उन्‍हें इस दिशा में पुख्‍ता तौर पर अग्रसर बनाएंगे। डॉ. पूनिया ने पशुपालकों को आश्‍वस्‍त किया कि वे व्‍यवसाय संबंधी आने वाली चुनौतियों के समाधान हेतु एनआरसीसी के विषय-विशेषज्ञों का भरपूर सहयोग लें। साथ ही उन्‍होंने राजकीय पशु ‘ऊँट’ के कल्‍याणार्थ इसमें नीतिगत बदलाव लाने की बात भी कही।

डॉ. वेद प्रकाश, परियोजना के प्रधान अन्‍वेषक ने बताया कि इस नेटवर्क परियोजना के तहत मेवाड़ी, मेवाती और मालवी उष्‍ट्र नस्ल के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु ऊँटपालकों को सशक्त बनाने का प्रयास किया जा रहा है। यह कार्यक्रम इसी उद्देश्‍यार्थ आयोजित किया गया।

प्रशिक्षण कार्यक्रम की समन्‍वयक डॉ. बसंती ज्‍योत्‍सना ने इस पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का विस्‍तृत ब्‍यौरा प्रस्‍तुत करते हुए कहा कि प्रशिक्षणार्थियों को दुधारू ऊँटों के प्रबंधन एवं डेयरी आधारित उद्यमिता विकास के अंतर्गत विभिन्‍न पहलुओं जैसे, प्रजनन एवं चयन पद्धति, प्रबंधन तहत आंकड़ा, उष्‍ट्र स्‍वास्‍थ्‍य के अलावा दूध का प्रसंस्‍करण एवं विपणन तथा दुग्‍ध उत्‍पादों का निर्माण एवं उद्यमिता विकास योजनाओं आदि की जानकारी विषय-विशेषज्ञों के माध्‍यम से प्रदान की गई।

अनुभव साझा (फीडबैक) सत्र में प्रशिक्षणार्थियों में श्री नरेन्‍द्र एवं श्री महेन्‍द्र आदि ने एनआरसीसी द्वारा आयोजित प्रशिक्षण को अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण बताते हुए कहा कि इसके माध्‍यम से ऊँटनी के दूध से विभिन्‍न उत्‍पाद जैसे कुल्‍फी, घी आदि बनाने, इसमें उद्यमिता से जुड़ी संभावनाएं, ऊँटों का वैज्ञानिक तरीके से आवास प्रबंधन, स्‍वास्‍थ्‍य तथा ऊँट मींगणी से वर्मी कम्‍पोस्‍ट तैयार करने आदि विविध विषय वर्गीय जानकारी ग्रहण की तथा इनका व्‍यावहारिक प्रशिक्षण भी लिया। साथ ही उष्‍ट्र पालन व्‍यवसाय में आ रही चुनौतियों का सामना करने में इस परियोजना तहत एनआरसीसी के सहयोग की सराहना भी की। प्रशिक्षणार्थियों को मुख्‍य अतिथि एवं अध्‍यक्ष महोदय द्वारा प्रमाण-पत्र वितरित किए गए तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम के सह समन्‍वयक डॉ. विश्व रंजन उपाध्याय, वैज्ञानिक ने समापन कार्यक्रम का संचालन किया।

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