
शिव अपनी सभी शक्तियाँ पार्वती से प्राप्त करते थे: मौली कौशल
नई दिल्ली, 7 मार्च 2026: साहित्य अकादेमी द्वारा अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आज ’लोक साहित्य में नारी चित्रण’ विषय पर एकदिवसीय परिसंवाद का आयोजन साहित्य अकादेमी के प्रथम तल स्थित सभागार में किया गया। इस कार्यक्रम में स्वागत वक्तव्य देते हुए साहित्य अकादेमी की कार्यक्रम अधिकारी मृगनयनी गुप्ता ने कहा कि लोक साहित्य केवल एक रचनात्मक अभिव्यक्ति नहीं है, यह एक समुदाय की भावनात्मक आत्मकथा है। इसके गीतों, कथाओं, कहावतों और रीतियों में हम नारी को माता, बेटियों, विद्रोहियों, प्रेमिकाओं, श्रमिकों, देवियों और शोषितों के रूप में मिलते हैं। बीज वक्तव्य देने के लिए प्रख्यात लोक साहित्य विशेषज्ञ मौली कौशल आॅनलाइन जुड़ीं। उन्होंने महिला शक्ति पर जोर दिया और शिव-पार्वती के समन्वय की कहानी के विभिन्न संस्करण प्रस्तुत किए। शिवशक्ति पर अपना दृष्टिकोण हम सभी के साथ साझा करते हुए उन्होंने कहा कि शिव अपनी सभी शक्तियाँ पार्वती से प्राप्त करते हैं, क्योंकि पार्वती शक्ति हैं।
पहले सत्र में लोक साहित्यकार प्रीति आर्या ने कुमाऊंनी लोकसाहित्य के बारे में बात करतेे हुए कहा कि लोकसाहित्य में आदिम परंपरा है, उसमंे स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि कुमाऊंनी अंचल में शिल्पकार वर्ग लोकसाहित्य के रचयिता हैं। वहाँ की स्त्री शुरू से ही सशक्त रही है। लोक में स्त्री किसी से कमतर नहीं है। लोक साहित्यकार एस्थर सैमुअल ने अंडमान की लोक परंपराओं और स्त्री जीवन का परिचय दिया। लोक साहित्यकार स्वाति आनंद ने छत्तीसगढ़ के लोकसाहित्य पर बात की। इस सत्र में लोक साहित्यकार सुगंधा नागर त्रिवेदी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पहले सभी वक्ताओं के वक्तव्य का सार प्रस्तुत किया। उन्होंने गुर्जर समाज के लोकगीत पर आधारित अपना वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए अपनी पुस्तक ’गुर्जरी लोकगीत’ पर भी बात की, जो दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान की गुर्जर महिलाओं पर आधारित लोकगीतों का संकलन है। उन्होंने यह भी बताया कि आशादेवी गुर्जरी पहली गुर्जर महिला थीं जिन्हें 11 अन्य महिलाओं के साथ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान फाँसी की सज़ा दी गई। इस सत्र के अंत में अमा काची मराक ने गारो लोकगीत प्रस्तुत किया।
दूसरे सत्र में जोराम आनिया ताना ने निशिं जनजाति के बारे में बात करते हुए कहा कि हमारे लोकसाहित्य का अपना एक इतिहास है। अरुणाचल की पाँच जनजातियाँ हैं, लेकिन सबका मूल एक है। उन्होंने जीत तानी और अबो तानी की लोककथा का उल्लेख किया। लोक साहित्यकार माहेश्वरी वीरसिंग गावित ने अपना वक्तव्य देते हुए रामची ढेरे का उल्लेख किया। उन्होंने आदिवासी लोकसाहित्य में महिलाओं का स्थान पर चर्चा करते हुए कहा कि आदिवासी समुदाय में स्त्री को प्रकृति से सबसे अधिक जुड़ा हुआ माना जाता है। उन्होंने बताया कि वर्ली जनजाति के लोकगीतों में गाय, स्त्री आदि का विशेष महत्त्व है। उन्होंने भील और वर्ली जनजातियों की विविध परंपराओं का भी उल्लेख करते हुए बताया कि कला के माध्यम से भी आदिवासी स्त्री सशक्त है। इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए लोक साहित्यकार वंदना टेटे ने दोनों वक्ताओं के वक्तव्य का संक्षेप में सार प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि लोकसाहित्य कहने पर अपनत्व-सा महसूस नहीं होता, इसलिए मैं इसे पुरखा साहित्य कहना पसंद करूँगी। उन्होंने कहा कि पुरखा साहित्य में कहीं भी विभाजन नहीं है। यह लोकसाहित्य हमारा आईना है जिसमें हम अपने इतिहास को देखते हैं। स्त्री के बिना सृजन संभव नहीं है। यह साहित्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे इतिहास को दर्शाता है। हमारे लोकगीत अनगढ़ तरीके से विद्यमान हैं। हमारे गीतों में सिर्फ़ करुण रस का ही नहीं प्रकृति के साथ प्रेम का भी चित्रण है। हमारी लोककथाएँ समानता और आत्मनिर्भरता की बात करती है। अंत में उन्होंने खड़िया में एक गीत प्रस्तुत किया जिसमें पिता अपनी पुत्री से कहते हैं कि मैं इस घर का खूँटा हूँ और तुम्हारी माँ छत है। विवाह के बाद भी यह घर तुम्हारा ही है।
तीसरे सत्र की शुरुआत में एस्थर सैमुअल ने निकोबारी लोकगीत प्रस्तुत किया, जिसमें निकोबार की सुंदरता का वर्णन किया गया था। गारो की लोक साहित्यकार बार्बरा ने गारो स्त्रियों से संबंधित परंपराओं पर बात करते हुए मीना खीरी रोकमे की सशक्तता पर भी बात की। उन्होंने कुछ लोककथाओं का भी जिक्र किया, जिनमें सशक्त नारियों का चित्रण था। लोक साहित्यकार बेनी सुमेर यांथन ने नागालैंड के आदिवासियों के लोकसाहित्य के इतिहास पर बात करते हुए कहा कि लोकगीतों में आदिवासी महिलाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने नागा संस्कृति के पारंपरिक वस्त्रों और उनकी परंपराओं पर भी बात की। लोक साहित्यकार गीता ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में लोकसाहित्य और उसमें निहित स्त्री स्वर और लोक परंपराओं पर बात की। लोकसाहित्य में बंजारा महिलाओं का चित्रण पर अपना लेख प्रस्तुत करते हुए उनके परिधान उनकी परंपराओं पर बात की और गौड़ बंजारा, लंबानी आदि जनजातियों की परंपराओं का विशेष तौर पर उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बंजारा लोकगीत में माँ की विशेष भूमिका होती है कार्यक्रम के अंत में साहित्य अकादेमी की सहायक संपादक लक्ष्मी कुमारी भगत नें धन्यवाद ज्ञापन दिया। कार्यक्रम का संचालन साहित्य अकादेमी की कार्यक्रम अधिकारी मृगनयनी गुप्ता ने किया।
















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