माधुरी शास्त्री , कवयित्री एवं साहित्यकार

नीम का रुदन
( माधुरी शास्त्री)
ओ प्रकृति के प्रेमी।
तुम्हें –
बीहड़ों से लगाव था,
जंगलों से प्यार था..
कलकल बहती नदियां,
वन निर्झर और पहाड़
सागरतट की रेत
सब तो मोहता था तुम्हें ।
नवपल्लवों की ममता,
सूखे पत्तों का क्रंदन,
हरी-हरी दूबों की मुस्कानें
सब कहाँ-कहाँ नहीं –
महसूस किया था तुमने?
सार्थक से निरर्थक तक
लघु से लघुतम तक
सभी को मुग्धभाव से
सींचा था तुमने
तभी तो उनका सौंदर्य भाव उत्तर आया था-
आत्मा के पार द्वार से
तुम्हारे -मन के कागज पर ।
जीवन भर तुमने, अनुभव को जिया
मौन को ओढ़ा सन्नाटे को पिया
शिव के विष की तरह।
ओ कालजयी !
आज क्यों रो रहा है-
नीम पर बना तुम्हारा वह हवामहल
जहाँ पन्नो पर उड़ेल देते थे-
मन की कथा व्यथा
आज वो
निःशब्द, मौन, जर्जर, अस्तिव हीन
व्याकुल सा खड़ा है –
तुम्होर लौट आने की आहट की आस में।
माधुरी शास्त्री








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