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दैहिक, आत्मिक व शारीरिक बल का मूल आधार ब्रह्मचर्य ही है : श्रीराजेन्द्रदासजी महाराज


बीकानेर। भीनासर स्थित मुरलीमनोहर मैदान में चल रही श्रीभक्तमाल कथा छठे दिवस बुधवार को श्रीरामानंदीय वैष्णव परम्परान्तर्गत श्रीमदजगद्गुरु मलूक पीठाधीश्वर पूज्य श्रीराजेन्द्रदास देवाचार्यजी महाराज ने कहा कि विभीषणजी को धर्मरथ का संदेश दिया वह अद्भुत है। दैहिक, आत्मिक व शारीरिक बल का मूल ब्रह्मचर्य है। देह का रक्षक देह का राजा ब्रह्मचर्य ही है। युग इस प्रकार का भयंकर आ गया है, खान-पान अशुद्ध हो गया है, वातावरण विकृत हो गया है। 25 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य का पालन करना जरूरी है और ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला बलशाली हो जाता है। काया दिन रात विषय यानि रूप रस गंध शब्द और स्पर्श का चारा चरती है। श्रीराजेन्द्रदासजी महाराज ने कहा कि शारीरिक बल तो पशु के पास भी होता है लेकिन चरित्र, सत्य, ब्रह्मचर्य प्राणायाम का बल केवल सदाचारी आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले साधक प्रकृति के भाग्यशाली मनुष्य को ही प्राप्त होता है। आत्मबल की बड़ी महिमा है। विवेक शून्य व्यक्ति के पास बल आ जाए तो बल ही उसकी विपत्ति का कारण बन जाता है। बल के साथ विवेक हो तो बलवान होना सार्थक है। सत्य और असत्य का पूर्ण बोध होना ही विवेक है। आयोजन समिति के घनश्याम रामावत ने बताया कि कथा के दौरान परमस्नेही क्षमारामजी महाराज, स्वामी विमर्शानंदजी महाराज का सान्निध्य रहा। आयोजन समिति के मयंक भारद्वाज ने बताया कि मुख्य यजमान दुर्गाप्रसाद मीमाणी, नरसिंहदास मीमाणी, जगदीश प्रसाद मीमाणी का अभिनन्दन किया गया। आरती में रामकिशन डागा, श्रीकिशन सारड़ा, कैलाश सारड़ा, कैलाश सोलंकी शामिल रहे। इस दौरान सुशील बाहेती, राजाराम धारणिया, बनवारी डेलू, विनोद जम्भदास, कन्हैयालाल जोशी, अरविन्द मिढ्ढा, टेकचंद बरडिय़ा, अमोलकजी आदि को स्मृति चिह्न भेंट कर स्वागत किया। कथा आयोजन में भंवरलाल साध, गजानंद रामावत, महादेव रामावत, मयंक भारद्वाज, श्रवण सोनी, कुलदीप सोनी एवं मदनदास आदि जुटे हुए हैं। आवास व्यवस्था नन्दकिशोर रामावत, बलदेवप्रसाद पंचारिया, महेश रामावत, अशोक रामावत, पवन रामावत, हिरण्यबहादुर आदि संभाल रहे हैं।

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