बात बराबरी की-मर्दों को लग रही मिर्ची:क्योंकि औरतें संपत्ति-ताकत में मांग रहीं हिस्सा; अब ये पुरुष अधिकार आंदोलन किसलिए?

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बात बराबरी की-मर्दों को लग रही मिर्ची:क्योंकि औरतें संपत्ति-ताकत में मांग रहीं हिस्सा; अब ये पुरुष अधिकार आंदोलन किसलिए?

इस साल ‘इंटरनेशनल मेन्स डे’ के दो हफ्ते बाद अमेरिका से एक सर्वे रिपोर्ट आई कि पूरी दुनिया में पुरुष अधिकार आंदोलन तेजी से सिर उठा रहे हैं। इसी साल जून में भारत की एक सर्वे रिपोर्ट थी, जो कह रही थी कि भारत में पिछले दो दशकों में मेन्स राइट्स मूवमेंट यानी पुरुष अधिकार आंदोलन काफी बढ़ गया है।

पिछले एक दशक में जॉर्डन पीटरसन जैसे मेन्स राइट्स एक्टिविस्टों का उभार और उनकी पॉपुलैरिटी भी बताती है कि पुरुषों को सचमुच अपने अधिकारों की चिंता सता रही है।

पुरुष इस बारे में सोचें कि पितृसत्ता ने कैसे औरतों के साथ उनकी मनुष्यता, उनके मानवीय अधिकार भी छीन लिए तो समझ में आता है। लेकिन पुुरुष अधिकार आंदोलन की चिंता का सवाल ये नहीं है। इतिहास में कभी नहीं था, जबकि पुरुष अधिकार आंदोलन का इतिहास भी अपने आप में काफी इंटरेस्टिंग है।

सोचकर देखिए, भारत आजादी की लड़ाई लड़े, ये बात तो समझ में आती है, लेकिन ब्रिटेन आजादी की लड़ाई लड़ने लगे तो। सवाल उठेगा कि तुम गुलाम कब थे, जो आजादी का झंडा उठाकर बैठ गए। मुझे बड़ा आश्चर्य होता है ये सोचकर कि इतिहास में कभी मेन्स राइट्स मूवमेंट का भी झंडा बुलंद हुआ था। एक दिन हजारों की तादाद में पुरुष झंडा- बैनर लेकर अपने लिए अधिकार और आजादी मांगने अमेरिका की सड़कों पर उतर पड़े थे।

पूरी दुनिया का इतिहास उठाकर देख लीजिए। हक, अधिकार, बराबरी की मांग कौन करता है? वो, जो हाशिए पर हो, जो ऐतिहासिक रूप से भेदभाव का शिकार हुआ हो, जो अधिकार और बराबरी से वंचित हो। जिसके पास अधिकार नहीं होंगे, वही न अधिकार मांगेगा।

सत्ता के पायदानों की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को कौन से अधिकार मांगने की जरूरत पड़ेगी भला। इस लिहाज से मानव इतिहास में पुरुषों ने कभी अधिकार और बराबरी के लिए कोई आंदोलन नहीं किया। ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता। औरतों ने जरूर 17वीं सदी से ही बराबरी मांगनी शुरू कर दी थी।

फ्रांस में 17वीं शताब्दी में पैदा हुई ओलुप दुगुस ने 17वीं सदी के अंत में एक मेनिफेस्टो लिखा। नाम था- ‘द डिक्लेरेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमन एंड द फीमेल सिटिजन’ (The Declaration of the Rights of Woman and of the Female Citizen)। यह स्त्री अधिकार का पहला ऐतिहासिक मेनिफेस्टो है। इस मेनिफेस्टो में ओलुप लिखती हैं- “प्रकृति में मनुष्य के अलावा कोई दूसरा ऐसा जीव नहीं, जो इतने सिस्टमैटिक तरीके से एक जेंडर के साथ क्रूरता की हद तक अन्याय और भेदभाव करता हो, जैसा पुरुष करते हैं।”

पता है, इस मेनिफेस्टो को लिखने का नतीजा क्या हुआ? ओलुप को जिंदा जला दिया गया और उसकी हत्या से जुड़े डॉक्यूमेंट्स और प्रमाणों को भी ताकि यह बात इतिहास में कहीं दर्ज न हो। लेकिन सच उस फीनिक्स परिंदे की तरह होता है, जो मरने के बाद भी अपनी राख से उठ खड़ा होता है। ओलुप दुगुस को दफनाने की पितृसत्ता की जी-तोड़ कोशिशों के बाद भी ओलुप को इतिहास में दफनाया न जा सका।

फिलहाल पितृसत्ता और पुरुषों की बनाई इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ औरतें तब से लड़ रही हैं, जब से अन्याय है। लेकिन इस पूरे दौरान पुरुषों की सारी ऊर्जा उनकी लड़ाई को दबाने-कुचलने में ही खर्च होती रही।

औरतों ने डेढ़ सौ सालों तक वोट देने के अधिकार के लिए संघर्ष किया। 18वीं सदी की शुरुआत में शुरू हुई यह लड़ाई 19वीं सदी के मध्य तक चली। सत्ता के शिखर पर बैठे पुरुषों को डेढ़ सौ साल लग गए यह स्वीकार करने में कि औरतों को भी वोट देने का अधिकार होना चाहिए। उन्होंने थोड़ी भौंहे तो तरेरीं, थोड़ा मुंह भी बिचकाया, लेकिन जन्म से और अनादिकाल से मिले अपने वोटिंग राइट को लेकर मुतमईन बैठे रहे। खुद के लिए आंदोलन की उन्हें जरूरत नहीं थी। औरतों का वोटिंग राइट मांगना उन्हें इतना नागवार भी नहीं गुजरा।

इतिहास में पहला मेन्स राइट्स मूवमेंट शुरू होता है 40-50 के दशक में, जब सेकेंड वेव फेमिनिस्ट मूवमेंट की शुरुआत हुई। सफरेज मूवमेंट यानी वोट देने के अधिकार के लिए डेढ़ सौ साल चला आंदोलन इतिहास में फर्स्ट वेव फेमिनिस्ट मूवमेंट कहलाया और उसके करीब 25 साल बाद शुरुआत हुई सेकेंड वेव फेमिनिस्ट मूवमेंट की।

यही वो समय था, जब अमेरिका समेत पूरी दुनिया में छोटे-छोटे समूहों में पुरुषों ने एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी शुरू की। लेकिन सवाल ये उठता है कि वो आवाज उठा क्यों रहे थे। वो कौन से अधिकार थे, जो पुरुषों को नहीं मिले थे-

– क्या उन्हें शिक्षा का अधिकार नहीं था ?

– क्या उन्हें नौकरी करने का अधिकार नहीं था ?

– क्या उन्हें अपने नाम से बैंक अकाउंट खुलवाने, क्रेडिट कार्ड रखने का अधिकार नहीं था?

– क्या उन्हें अपने नाम से मकान, जमीन, संपत्ति खरीदने का अधिकार नहीं था ?

– क्या उन्हें अपनी मर्जी से विवाह करने, न करने, पिता बनने या न बनने का अधिकार नहीं था?

– क्या उन्हें समान वेतन का अधिकार नहीं था?

ये वो सारे अधिकार थे, जो उस वक्त औरतों को हासिल नहीं थे। वो पिता या पति की मर्जी के बगैर न बैंक अकाउंट खुलवा सकती थीं, न क्रेडिट कार्ड रख सकती थीं, न घर-मकान खरीद सकती थीं, न नौकरी कर सकती थीं। यहां तक कि वो अपनी मर्जी से कॉन्ट्रेसेप्शन का भी इस्तेमाल नहीं कर सकती थीं और न ही अबॉर्शन करवा सकती थीं। यही वो बुनियादी मानवीय अधिकार थे, जो सेकेंड वेव फेमिनिस्ट मूवमेंट की बुनियाद बने।

औरतें रसोई और बेडरूम की चारदीवारी से निकलकर बाहर की दुनिया में अपना हिस्सा मांगने लगीं। नौकरी में अपना हिस्‍सा, संसद में अपना हिस्‍सा, शिक्षा में अपना हिस्सा, न्यायालय में अपना हिस्सा। सेना में, सरकार में, हर उस जगह में अपना हिस्सा, जहां अब तक उनका कोई हिस्सा नहीं था। वो अपनी मर्जी से शादी करने का अधिकार और शादी न करने का अधिकार, अपनी खुशी से बच्‍चा पैदा करने का अधिकार और बच्चा न पैदा करने का अधिकार मांगने लगीं। वो अबॉर्शन का अधिकार मांगने लगीं। यह आवाज इतनी तेज थी कि संसद से लेकर न्यायालय तक पहुंची, सुनी गई, कानून बनी। इक्वल राइट्स एमेंडमेंट एक्ट लागू हुआ।

लेकिन विडंबना देखिए कि इस आंदोलन के एक दशक गुजरते न गुजरते मेन्स राइट्स मूवमेंट की भी शुरुआत हो गई और आपको ये सुनकर हंसी आएगी कि मेन्स राइट्स मूवमेंट का दरअसल मुद्दा क्या था। मुद्दा था कि परिवार टूट रहे हैं। परिवार के मुखिया के बतौर पुरुष का ओहदा समाज में कम हो रहा है। स्त्रियां आजादी के नाम पर तलाक मांग रही हैं। अपने और बच्चों के भरण-पोषण के लिए पुरुषों पर उनकी निर्भरता खत्म होती जा रही है। पुरुष अपना पुरुषत्व खो रहे हैं। उनके जीवन का महत्व और सार्थकता खो रही है। वे दिशाहीन हो रहे हैं। यह न सिर्फ पुरुषों बल्कि पूरे समाज पर मंडरा रहा संकट है। पुरुषों को अपना खोया गौरव वापस चाहिए।

पता है ये मूवमेंट कैसा था। फर्ज करिए कि दुनिया के जिन-जिन मुल्कों पर ब्रिटेन ने हुकूमत की, उन्हें अपना गुलाम बनाकर रखा, वे सब आंदोलन करके, लड़कर ब्रिटेन की दासता से मुक्त हो गए। तो अब ब्रिटेन इस बाबत एक नया आंदोलन शुरू कर दे कि ब्रिटिश राज का क्या राजसी वैभव और गौरव था। उसके राज में कभी सूरज डूबता ही नहीं था। ब्रिटेन को अपना वो पुराना गौरव वापस चाहिए।

कैसा लग रहा है सुनकर। किसी मानसिक दिवालिए की बकबक जैसी सुनाई देती है ये बात।

ऐसा ही मानसिक दिवालियापन था 50 के दशक में शुरू हुआ पुरुष अधिकार आंदोलन। और उसी मानसिक दिवालिएपन का शिकार है ये पुरुष अधिकार आंदोलन, जो इस वक्त पूरी दुनिया में सिर उठा रहा है।

इस आंदोलन की चिंताएं भी यही हैं कि परिवार टूट रहे हैं; औरतें तलाक मांग रही हैं; परिवार और समाज में मर्दों की हैसियत और ओहदा कम होता जा रहा है। और सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि औरतें मां-पत्नी की पारंपरिक भूमिका को छोड़कर बाहर की दुनिया में दखल दे रही हैं। सपंत्ति और ताकत में अपना हिस्सा मांग रही हैं। और इस बात से मर्दों को बहुत मिर्ची लग रही है।

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