आखिर क्यों मतदाता को मतदान केंद्र तक बुलाने में विफल रहे राजनेता ? : लाख जतन के बाद भी नहीं बढ़ पाया वोटिंग प्रतिशत

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Dr Mudita Popli

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बीकानेर। लोकसभा चुनाव में वोट प्रतिशत बढ़ाने के लिए प्रशासन द्वारा अपनी पूरी ताकत झोंक दी गई थी। जिला कलेक्टर से लेकर शहर की सभी विशिष्ट शख्सियतों, उद्योग जगत, साहित्यकार, शिक्षा अधिकारी, बैंकिंग अधिकारी सहित सभी विभाग के आला अफसर इस लोकतंत्र के महापर्व में आहुति देने के लिए चलाए जा रहे अभियान में सहयोग देते रहे। बीकानेर में वर्तमान में जिला कलेक्टर , जिला पुलिस अधीक्षक तथा संभागीय आयुक्त तीनों पदों पर महिलाओं के नियुक्त होने के चलते महिला शक्ति को वोटिंग के लिए प्रोत्साहित करने के लिए स्वयं जिला कलेक्टर आगे आईं तथा उन्होंने महिला मतदाताओं से वोटिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की अपील की।इसके बावजूद यदि आंकड़ों का अन्वेषण करें तो बीकानेर संसदीय क्षेत्र में कुल 53.96 प्रतिशत मतदान हुआ। जबकि शत प्रतिशत मतदान के लिए अधिकारी वर्ग अपनी पूरी ताकत के साथ कार्यरत रहा।
सर्वाधिक मतदान प्रतिशत अनूपगढ़ विधानसभा क्षेत्र में रहा जहां 67.10 प्रतिशत लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। खाजूवाला विधानसभा क्षेत्र में 57.59, बीकानेर पश्चिम में 63.51, बीकानेर पूर्व में 61.40, श्रीडूंगरगढ़ विधानसभा क्षेत्र में 48.98, कोलायत में 46.20, लूणकरनसर विधानसभा में 50.10 तथा नोखा विधानसभा क्षेत्र में 40.27 प्रतिशत मतदान हुआ।
भारत ने बहुत लंबे समय तक आजादी की लड़ाई लड़ी है और वोट देने का अधिकार भी भारत के नागरिकों को इतनी आसानी से नहीं मिला है यह तथ्य शायद अब हम भूल गए हैं, इतिहास पर दृष्टि डालें तो कांग्रेस के नेताओं के दबाव में अंग्रेजों ने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के तहत प्रांतीय चुनाव कराए थे। लेकिन उसमें सभी लोगों को वोट देने का अधिकार नहीं दिया गया था। साक्षरता, जाति, जमीन-जायदाद और टैक्स पेमेंट जैसे कई पैमाने लगाकर अधिकतर लोगों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया था।उस वक्त बमुश्किल 14% लोगों को वोट देने का अधिकार मिला था।
इसके अलावा 1928 में भारत के संविधान की बुनियादी बातें तय करने के लिए जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कमेटी बनी थी। कमेटी ने वयस्क मताधिकार को सही माना था।पहले गोलमेज सम्मेलन में इस बारे में जो उप-समिति बनी, उसका भी कहना था कि इसे लागू किया जाना चाहिए। हालांकि 1932 में रिपोर्ट देने वाली इंडियन फ्रेंचाइजी कमेटी इस नतीजे पर पहुंची कि वयस्क मताधिकार का फैसला राज्यों पर छोड़ देना चाहिए। संविधान सभा की फंडामेंटल राइट्स सब-कमिटी और माइनॉरिटीज सब-कमिटी ने कहा कि वयस्क मताधिकार को भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। माइनॉरिटीज और फंडामेंटल राइट्स से जुड़ी अडवाइजरी कमिटी ने इस सलाह को ठीक तो माना था लेकिन सुझाव यह दिया कि मौलिक अधिकार बनाने के बजाय वयस्क मताधिकार की बात को संविधान में कहीं और दर्ज किया जाए। वहीं संविधान के आर्टिकल 326 में यह प्रावधान किया गया कि संसद और विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे।इस तरह 1951-52 के पहले चुनाव से आजाद भारत में वयस्क मताधिकार लागू हो गया था। आज जब यह अधिकार हमें इतनी आसानी से मिल गया है तो हम इस अधिकार की महत्व को शायद भूल गए हैं कहां भी गया है जो चीज आसानी से मिल जाती है हम उसकी महत्ता को भूलने लगते हैं।
लोकतंत्र के इस महापर्व में आहुति देना प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है और उसकी आहुति के बिना यह यज्ञ पूर्ण हो ही नहीं सकता। कम वोटिंग ने एक बार फिर कई सवाल खड़े कर दिए हैं शायद हमें फिर से एक नई जमीन तैयार करने की जरूरत है ताकि आने वाली पौध मताधिकार की महत्ता को समझ सके और इस यज्ञ में अपनी आहुति दे।

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