चातुर्मास का धार्मिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण  :- कनक लता जैन

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चातुर्मास का धार्मिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण  :-

लेखिका : कनक लता जैन (गुवाहाटी ) असम

“आत्म उत्थान अब करों , आया चातुर्मास।
हो धर्म की प्रभावना, आत्मविषयक विकास” ।।

आपके दिमाग में कभी तो यह प्रश्न आया ही होगा कि क्या है चातुर्मास और इसका महत्व क्या है .? तो चलिए संक्षेप में समझाते है चातुर्मास और इसके महत्व को ।।

हमारा भारत देश विभिन्नता में एकता का देश है,और यही इस की खूबसूरती है। हर धर्म के जितने भी बड़े तीज- त्योहार होते है सब चातुर्मास में ही आते है।।

चातुर्मास यानी चार महीनो की अवधि , जो आषाढ़ी पुर्णिमा से प्रारंभ हो कर कार्तिक पूर्णिमा तक , यानी वर्षा ऋतु के आगमन से शरद ऋतु के आगमन तक चातुर्मास की अवधि होती है।।
इस दौरान सूर्य उत्तरायण से दक्षिणायन की और अग्रसर होता है।धीरे -धीरे दिन छोटे और राते लंबी होने लगती है ।।
आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन,और कार्तिक ,चातुर्मास के यह चार महीने ; हिन्दू, बौद्ध, और जैन धर्म में खास महत्व रखते है।।

हिन्दू धर्म ; मान्यता है कि चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा के लिए चले जाते है। इन चार महीने सृष्टि का संचालन शिव करते है । इन दिनों मांगलिक कार्य निषेद होते है।।
केवल धार्मिक अनुष्ठानों को ही महत्व दिया जाता है।।

बौद्ध धर्म  ; चातुर्मास की परंपरा बौद्ध धर्म में भी प्रचलित है । बौद्ध इसे “वर्षावास “कहते हैं।भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद काशी के सारनाथ में आषाढ़ी पूर्णिमा में पहला उपदेश दिया था।
वर्तमान में बौद्ध भिक्षु चातुर्मास के दौरान किसी मंदिर या मठ में ठहर कर साधना करते है। सांची के बौद्ध स्तूप में चातुर्मास के दौरान साधना हेतु हजारों बौद्ध भिक्षु आते है, जिसमें बड़ी संख्या में बौद्ध अनुयायी शामिल होते है।।

जैन धर्म ; जैन धर्म में चातुर्मास का महत्वपूर्ण स्थान है। चातुर्मास के चार महीने जैन साधु – साध्वियांँ विहार नही करते, क्योंकि वर्षा ऋतु का आगमन हो जाता है ,और बारिश में जीवोत्पत्ति ज्यादा होती है। सूक्ष्म जीव पैरों के नीचे आ सकते है,जैन धर्म में सूक्ष्म हिंसा भी महापाप है। बारिश के दौरान सभी नदी-नाले उफान पर होते हैं । जैन साधु-साध्वी किसी साधन का उपयोग नही करते ,वे आज के संसाधनों से भरे युग में भी पैदल ही यात्रा करते है । वर्षा ऋतु में पैदल लम्बी यात्रा करना संभव नही ।।
चातुर्मास हर वर्ष देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होता है ,जो कि इस वर्ष 29 जून से शुरू हो कर 23 नवंबर देवउठनी एकादशी पर समाप्त होगा ।। तेरापंथ धर्म संघ के ग्यारवे  अधिशास्ता युग प्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी अपनी धवल सेना के साथ इस वर्ष चातुर्मास के दौरान भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई की धरती पर विराजेगे।
ज्ञातव्य हो कि 69 वर्ष पूर्व मुम्बई में गणधिपति आचार्य श्री तुलसी जी का चातुर्मास हुआ था ।।

2023 में आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी का अहिंसा यात्रा के साथ आगमन हुआ था ।
चातुर्मास में बहुआयामी आध्यात्मिक , सामाजिक गतिविधियों के साथ पूरे विश्व में अहिंसा, शांति, सद्भभावना, नैतिकता और व्यसनमुक्ति का संदेश जाएगा ।।

केवल तेरापंथी ही नहीं समाज के हर वर्ग को आचार्य श्री के प्रवचनों से लाभान्वित व प्रेरित होने का सुनहरा अवसर प्राप्त होगा ।।
चातुर्मास में साधु – साध्वियों के सानिध्य में प्रेरित हो कर लोग अपनी -अपनी क्षमता अनुसार, उपवास, बेला, तेला, अठाई, आदि से ले कर मासिक तपस्या तक करते है । तपस्या से लोग संयमित होने का प्रयास करते है । भौतिक सुख सुविधाओं को त्याग कर ,जप- तप, ध्यान, रात्रि भोजन का त्याग व ब्रह्मचर्य का पालन करते है। चातुर्मास में ही जैनियों का “महा पर्व पर्युषण” भी आता है जो कि सकल जैन समाज द्वारा बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। सकल जैन समाज इस दौरान प्रतिक्रमण कर के जाने – अनजाने हुए कर्मो की क्षमायाचना करते है।।

अब जानिए चातुर्मास का वैज्ञानिक दृष्टिकोण ; हमारी पाचन शक्ति पर सूर्य का विशेष प्रभाव रहता है , इसलिए सूर्यास्त के बाद भोजन करने को निषेद बताया गया है । चातुर्मास में सूर्य दक्षिणायन होने की वजह से ऋतु में परिवर्तन होता है,चातुर्मास वर्षा ऋतु से प्रारमभ होता है, और अंत  शरद ऋतु के आगमन से होता है ।।
इस दौरान हमारी पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती है । वही भोजन और जल में कीट की तादात भी बड़ जाती है । इस दौरान जल के दूषित होने की संभावना अधिक होती है । इसलिए जल संबंधी बीमारियों के बढ़ने की आशंका बढ़ जाती है । क्योंकि बरसात के मौसम में जमीनी कीड़े पैदा हो जाते है , हरी पत्तेदार और जमीनकंद सब्ब्जिया
कीट के संक्रमण से ग्रषित होती है । ऐसे में इनका सेवन करना शरीर के लिए हानिकारक है ।

हमारे शरीर में वात, पित्त, कफ तीनो असामान्य आहार -विहार से विकृत हो जाते है।पेट की जठरागनी कमजोर हो जाती है।। पाचन संबंधी रोग उत्पन होते है।इस लिए इन दिनों खानपान में अत्यंत सावधानी बरतने की आवश्यकता होती हैं ।

सावन दो होने के कारण साल 2023 में चातुर्मास 5 महीने का होगा जो कि आमतौर पर चार महीने का ही होता है।।
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