मैं हर बार अकेली रह जाती हूंँ,
क्योंकि दोहरे चरित्र में नहीं जी पाती हूंँ।
सारे की सारे अपने पराये खिलाड़ी निकले,
मैं सिर्फ मोहरा बनी रही उनके किए का।
सपूतों को पालने का अंजाम लाजमी था,
वह डस्ते चले गए और मैं सहती चली गई।
खुद को सही दिखाने के हजार बहाने,
वो अनगिनत कसमें खाते रहें हर बार।
सच छुपाने के लिए चलते रहें नई चाल,
हजारों झूठों की दुकान लगाते रहे।
चरित्र उनका काश सबके सामने आए,
उनका किया उनको भी भुगतना पड़ जाए।
फिर किसी को छलनें का दुस्साहस,
वह कभी ना कर पाए!
झूठा नकाब शराफत का, बस अब उतर ही जाए,
भोली सी शक्ल बनाकर, जैसे मुझे छला था.
कोई तो उन्हें भी उनका असली रूप दिखायें।
रत्ना मजूमदार
बालाघाट (मध्य प्रदेश)







