बीकानेर। जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। यानि जिसकी जैसी भावना प्रभु उसे वैसी ही दृष्टि देते हैं। यदि कथा को हमें अमृत के रूप में ग्रहण करना है तो अमृत का फल प्राप्त होगा। यह उद्गार माखनभोग में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिवस श्रीसुखदेवजी महाराज ने व्यक्त किए। श्रीसुखदेवजी महाराज ने कहा कि जीवन में संतुष्ट होना सीखें, जिज्ञासाओं को शांत करें। समय हमें कहता है कि अपने जीवन में सुधार करें, कुछ श्रेष्ठ पाने के लिए परिवर्तन करना जरूरी है। संत श्री सुखदेवजी महाराज ने कहा कि हमें कुछ छोटे-छोटे संकल्प लेने चाहिए जिससे हमारा जीवन सरल बने। उन्होंने कहा कि भोजन करते समय कभी मोबाइल नहीं चलाना चाहिए तथा आरती अथवा मंदिर में दर्शन के समय भी मोबाइल का उपयोग नहीं करना चाहिए। आयोजन से जुड़े घनश्याम रामावत ने बताया कि कथा में भगवान सुखदेवजी का जन्म वृतांत और पितामह भीष्म व श्रीकृष्ण संवाद सुनाया गया। शुक्रवार को भगवान सुखदेवजी के पास परीक्षित जाएंगे व आत्मज्ञान लेंगे तथा कपिल मुनि अवतार का वृतांत किया जाएगा। कथा के दौरान सजीव झांकियों की भी प्रस्तुति दी जाती है। गुरुवार को यजमान राजेन्द्र आचार्य ने पौथी पूजन किया। कथा में भंवरलाल चांडक, द्वारकाप्रसाद राठी, राजेन्द्र आचार्य, पं. राधेश्याम शास्त्री आदि आरती में उपस्थित रहे।
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