23 मार्च को क्या हुआ था बच्चो को जानना है जरूरी की आज़ादी चरखे से नही विरो के बलदान से मिली थी

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23 मार्च को क्या हुआ था बच्चो को जानना है जरूरी की आज़ादी चरखे से नही विरो के बलदान से मिली थी

विश्व हिंदू सेवा संघ राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष रोहित शर्मा द्वारा कहा गया देश के पाठ्यक्रम में बदलाव होना है आवश्यक
23 मार्च केवल मात्र एक शहीदों की पुण्यतिथि नही यह गांधी जी पर एक सवाल है जो कि अहिंसा के पुजारी माने जाते थे गांधी जी द्वारा अहिंसा के नारे देश मे लगवाए गए लेकिन देशभक्तों की फांसी नही रोक सके वे चाहते तो रोक सकते थे दरअसल अहिंसा को जीवन साधना और लक्ष्य मानने वाले गांधी तो मृत्युदंड के ही विरोधी थे
भगत सिंह को फांसी से बचाने में गांधी के विफल रहने के बारे में प्रचलित धारणाओं को इस नजरिए से भी देखा जाना चाहिए. अहिंसा के साधक गांधी किसी भी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की सजा देने के विरोधी रहे थे. भगत सिंह से पहले उन्होंने अन्य मामलों में भी किसी को भी मृत्युदंड दिए जाने का विरोध किया था. उच्च कोटि के आस्तिक गांधी यह मानते थे कि किसी की जान लेने का हक केवल उसे ही है जिसने वह प्राण दिया है. यानी प्रकृति का नियम या ईश्वर ही किसी की जान ले सकता है, न कि कोई मनुष्य, सरकार या मनुष्य द्वारा बनाई कोई व्यवस्था.
26 मार्च, 1931 को कराची अधिवेशन में भगत सिंह के संदर्भ में ही बोलते हुए उन्होंने कहा था- ‘आपको जानना चाहिए कि खूनी को, चोर को, डाकू को भी सजा देना मेरे धर्म के विरुद्ध है. इसलिए इस शक की तो कोई वजह ही नहीं हो सकती कि मैं भगत सिंह को बचाना नहीं चाहता था.’ इस सभा में नौजवान भारत सभा के सदस्य भी बड़ी संख्या में मौजूद थे. दीवान चमनलाल जो नौजवान भारत सभा के सचिव थे, वे तो गांधी के अन्यतम सहयोगियों में से ही थे और वहां भी उनके साथ ही थे. इतने संवेदनशील और भावुक माहौल में भी गांधी पूरे होश में और पूरी करुणा से अपनी बात रख रहे थे. इतिहास में बदलाव होना आवश्यक है बच्चो की किताबो में यह होना ही चाहिए कि अहिंसा के पूजारी ओर देश के नेहरू चाहते तो यह फांसी रोक सकते थे लेकिन नही रोकी

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