
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि पत्रावली पर आई सामग्री से यह पाया जाता है की प्रार्थनी ने अप्रार्थी के साथ उस समय विवाह किया जब अप्रार्थी सेवानिवृत्ति के कगार पर था अप्रार्थी की ओर से प्रस्तुत जवाब के अनुसार प्रार्थनी पूर्व में शादीशुदा थी परंतु प्रार्थनी ने न्यायालय में इस स्थिति को न्यायालय के समक्ष स्पष्ट नहीं किया और ना हीं यह स्पष्ट किया कि उसका विवाह विवाह किन परिस्थितियों में अप्रार्थी के साथ हुआ प्राथीनी
तथा अप्राथीं के विवाह की परिस्थितियों यद्यपि साक्षी की मोहताज है परंतु पत्रावली पर आई सामग्री से प्रथम दृष्टि यह नहीं पाया जाता की प्रार्थनी के द्वारा प्रार्थना पत्र का बिना किसी उचित कारण के अपनी वृद्धावस्था में स्वेच्छा परित्याग किया हो अतः प्रार्थना के द्वारा अप्रार्थी से पृथक होने के कारणो की जांच मूल पत्रावली में साक्षी लेखपत करने के उपरांत ही की जा सकती है प्रार्थनी लगभग 20 वर्षों से अधिक अनुभव प्राप्त अधिवक्ता है यदपि प्रार्थनी ने अपने आवेदन में कथन किया कि उसने अधिवक्ता के रूप में अपना स्टेटस साबित करने हेतु बार काउंसिल का प्रमाण पत्र सनंद स्थगन करवाई जाने का प्रमाण पत्र अधिवक्ता के रूप में कार्य करने के अनुभव का स्थान इत्यादि उल्लेख नहीं किया ने ही अपनी संपदा व दायित्वों से संबंधित शपथ पत्र पेश किया जबकि अप्रार्थी द्वारा प्रस्तुत सामग्री में यह पाया जाता है की अप्राथी की 70 वर्ष का वृद्ध व्यक्ति है तथा लंबे समय से ब्लैक फंगस जैसी गंभीर बीमारी पीड़ित रहने के बाद उसका जबड़ा काट दिया गया है तथा एक आंख निकाल दी गई है वह लंबे समय तक एम्स जोधपुर में चिकित्साधीन रहा अप्राथी सेवानिवृत अध्यापक है परंतु पत्रावली में आए अभिलेख से यह प्रकट नहीं होता कि अप्रार्थी के सिवा रिकॉर्ड में प्रार्थना पत्नी की हैसियत रखती है अथवा नहीं यह नॉमिनी है अथवा नहीं प्रार्थना को पत्नी की हैसियत से अप्राथी पारिवारिक पेंशन प्राप्त कर रहा है अथवा नहीं जबकि प्रार्थनी 20 वर्षों से अधिक अनुभव प्राप्त अधिवक्ता है तथा प्रथम दृष्टि यह स्वयं अपना भरण पोषण करने में सक्षम है अतः इस स्तर पर साक्षी के अभाव में प्रार्थना को को अंतिम भरण पोषण दिलवाई जाने के कोई समुचित आधार नहीं होने के कारण प्रार्थना द्वारा प्रस्तुत आवेदन खारिज किया जाना न्याय उचित है इस मामले में अपराध की ओर से एडवोकेट लालचंद मेघवाल ने पैरवी की

















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