दूध: पोषण, आजीविका और विश्वास का प्रतीक(विश्व दुग्ध दिवस पर विशेष)

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डॉ. अनिल कुमार पूनिया, निदेशक, भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर, राजस्थान

प्रतिवर्ष 1 जून को मनाया जाने वाला “विश्व दुग्ध दिवस” हमें केवल दूध के पोषण महत्व की याद नहीं दिलाता, बल्कि उन करोड़ों लोगों के योगदान को भी सम्मान देने का अवसर प्रदान करता है, जिनकी मेहनत, तकनीकी दक्षता और समर्पण से यह अमृत प्रतिदिन हमारे घरों तक पहुंचता है। दूध मानव जीवन के सबसे प्राचीन, संपूर्ण और पौष्टिक आहारों में से एक है। भारतीय संस्कृति में इसे केवल भोजन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, समृद्धि और पवित्रता का प्रतीक माना गया है। शिशु के जन्म के प्रथम आहार से लेकर व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक चरण तक दूध हमारे पोषण का आधार बना रहता है। यही कारण है कि भारतीय समाज में सदियों से यह आशीर्वाद दिया जाता रहा है कि “दूधों नहाओ, पूतों फलो।”

भारत विश्व का दुग्ध महाशक्ति राष्ट्र

वर्तमान में भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है। देश का वर्तमान वार्षिक दुग्ध उत्पादन 248 मिलियन टन से अधिक है तथा वैश्विक दुग्ध उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 23 प्रतिशत है। सरल शब्दों में कहें तो दुनिया में उत्पादित प्रत्येक चार लीटर दूध में से लगभग एक लीटर दूध भारत में उत्पादित होता है। देश में प्रति व्यक्ति दुग्ध उपलब्धता लगभग 485 ग्राम प्रतिदिन है, जो विश्व औसत से काफी अधिक है। यह उपलब्धि करोड़ों छोटे एवं सीमांत पशुपालकों, ग्रामीण महिलाओं, दुग्ध सहकारी समितियों, वैज्ञानिकों तथा डेयरी उद्योग के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है।

डॉ. वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में प्रारंभ हुई श्वेत क्रांति ने भारत को दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा प्रदान की। आज दुग्ध क्षेत्र देश के करोड़ों परिवारों के लिए नियमित आय का सबसे विश्वसनीय स्रोत बन चुका है।

एक “पैकेट दूध” के पीछे छिपी अनकही कहानी

प्रातःकाल जब हम चाय की चुस्की लेते हैं या बच्चों को दूध का गिलास देते हैं, तब शायद ही यह विचार करते हों कि इस दूध की प्रत्येक बूंद कितनी लंबी और वैज्ञानिक प्रक्रिया से होकर हमारे घर तक पहुंचती है। इस यात्रा की शुरुआत गांव के उस पशुपालक से होती है, जो अलसुबह अपने पशुओं की देखभाल करते हुए दुग्ध दोहन करता है।

इसके बाद दूध ग्राम स्तरीय दुग्ध संग्रहण केंद्र तक पहुंचता है, जहां उसकी गुणवत्ता, फैट एवं वसा रहित ठोस पदार्थों (एसएनएफ) की जांच की जाती है। संग्रहित दूध को तुरंत बल्क मिल्क कूलर में लगभग 4 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है। इसके पश्चात इंसुलेटेड टैंकर द्वारा दूध को डेयरी प्रसंस्करण संयंत्रों तक पहुंचाया जाता है। वहां पाश्चुरीकरण, होमोजिनाइजेशन, गुणवत्ता परीक्षण और सुरक्षित पैकेजिंग जैसी आधुनिक प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद ही वह उपभोक्ता तक पहुंचने योग्य बनता है।

रात्रि के समय जब अधिकांश लोग विश्राम कर रहे होते हैं, तब परिवहनकर्ता, वितरक, डेयरी कर्मी, हॉकर और विक्रेता इस पूरी व्यवस्था को संचालित करते हैं ताकि सुबह तक ताजा और सुरक्षित दूध प्रत्येक घर तक पहुंच सके।

दूध करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार

दूध केवल पोषण नहीं देता, बल्कि आजीविका भी प्रदान करता है। भारत में लगभग 8 करोड़ से अधिक परिवार प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दुग्ध व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। पशुपालक, चारा उत्पादक, पशु चिकित्सक, कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ता, दुग्ध संग्रहण केंद्र संचालक, टैंकर चालक, प्रयोगशाला कर्मी, डेयरी तकनीशियन, पैकेजिंग उद्योग, वितरक, खुदरा विक्रेता और डेयरी उद्यमी — ये सभी इस विशाल आर्थिक तंत्र का हिस्सा हैं।

जब उपभोक्ता दूध का एक पैकेट खरीदता है, तब उसकी कीमत केवल दूध की नहीं होती। उसमें पशुपालक का श्रम, पशुओं का पोषण, वैज्ञानिक परीक्षण, शीत श्रृंखला, परिवहन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और वितरण तंत्र का योगदान भी शामिल होता है। इस प्रकार दूध का प्रत्येक पैकेट अनेक परिवारों की आजीविका का आधार बनता है।

मूल्य संवर्धन: दूध से समृद्धि तक

दुग्ध क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है “मूल्य संवर्धन”। यदि दूध को केवल कच्चे रूप में बेचा जाए तो उसका मूल्य सीमित रहता है, लेकिन यही दूध जब दही, पनीर, घी, मक्खन, छाछ, खोया, आइसक्रीम, चीज अथवा मिठाइयों में परिवर्तित किया जाता है, तो उसका आर्थिक मूल्य कई गुना बढ़ जाता है।

उदाहरण के लिए लगभग 600 रुपये मूल्य का 10 लीटर दूध मूल्य संवर्धन के पश्चात 1,500 से 3,000 रुपये अथवा उससे अधिक मूल्य के उत्पादों में परिवर्तित हो सकता है। यही कारण है कि डेयरी आधारित उद्यमिता किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण युवाओं के लिए आय वृद्धि का अहम माध्यम बनती जा रही है।

नॉन-बोवाइन दुग्ध: पोषण और स्वास्थ्य की नई दिशा

पारंपरिक रूप से दुग्ध उत्पादन में गाय और भैंस की प्रमुख भूमिका रही है, किंतु वर्तमान समय में बकरी, ऊंटनी, गधी तथा अन्य पशुओं से प्राप्त नॉन-बोवाइन दुग्ध (Non-Bovine Milk) भी पोषण एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में विशेष महत्व प्राप्त कर रहा है।

इन दुग्धों में विशिष्ट जैव-सक्रिय तत्व, खनिज, विटामिन तथा कार्यात्मक (Functional) गुण पाए जाते हैं, जिनके कारण वैश्विक स्तर पर इनके प्रति रुचि निरंतर बढ़ रही है। विशेष रूप से ऊंटनी का दूध मरुस्थलीय क्षेत्रों में पोषण, स्वास्थ्य एवं आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत बनकर उभरा है।

भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर के प्रयासों से ऊंटनी के दूध की लोकप्रियता और सामाजिक स्वीकार्यता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है तथा इसके प्रति उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ा है। यह दूध विटामिन-सी, लौह (आयरन), जिंक तथा अन्य आवश्यक खनिजों से समृद्ध होता है। इसके अतिरिक्त इसमें लैक्टोफेरिन, इम्युनोग्लोब्युलिन्स तथा अन्य जैव-सक्रिय घटक पाए जाते हैं, जिनके कारण इसे स्वास्थ्यवर्धक दुग्ध के रूप में विशेष पहचान प्राप्त हुई है।

विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों में ऊंटनी के दूध की संभावनाओं का मूल्यांकन मधुमेह प्रबंधन, रोग प्रतिरोधक क्षमता सुदृढ़ीकरण तथा पोषण सुरक्षा के संदर्भ में भी किया जा रहा है।

जैसा कि मरुस्थलीय पशुपालकों की आजीविका सुदृढ़ करने की दिशा में राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिकों द्वारा ऊंटनी के दूध से आइसक्रीम, कुल्फी, कॉफी, चाय, फ्लेवर्ड मिल्क, लस्सी, घी, कैमल मिल्क पाउडर, पेड़ा एवं अन्य अनेक मूल्य-संवर्धित दुग्ध उत्पाद विकसित किए जा चुके हैं तथा इस दिशा में निरंतर अनुसंधान एवं नवाचार कार्य जारी हैं। इससे न केवल ऊंट पालन को नई दिशा मिल रही है, बल्कि ग्रामीण उद्यमिता, पोषण सुरक्षा और सतत आजीविका के नए अवसर भी विकसित हो रहे हैं।

दूध विश्वास और संस्कृति का द्योतक

भारतीय समाज में दूध केवल पोषण का स्रोत नहीं, बल्कि विश्वास और शुद्धता का भी प्रतीक है। “दूध का दूध और पानी का पानी” जैसी प्रसिद्ध लोकोक्ति सत्य, पारदर्शिता और निष्पक्षता का संदेश देती है। हमारे धार्मिक अनुष्ठानों, पर्वों और पारिवारिक परंपराओं में दूध एवं दुग्ध उत्पादों का विशेष महत्व रहा है। यही कारण है कि दूध भारतीय जीवनशैली और संस्कृति का अभिन्न अंग बना हुआ है।

निष्कर्ष

सुबह की चाय की एक चुस्की में केवल दूध का स्वाद नहीं होता; उसमें पशुपालक का श्रम, वैज्ञानिक का ज्ञान, तकनीशियन की दक्षता, परिवहनकर्ता की जिम्मेदारी और विक्रेता की प्रतिबद्धता भी शामिल होती है। दूध का प्रत्येक पैकेट हमें यह संदेश देता है कि राष्ट्र निर्माण केवल बड़े उद्योगों से नहीं, बल्कि करोड़ों मेहनतकश हाथों के सामूहिक प्रयास से होता है।

यह पोषण का आधार है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संबल है, उद्यमिता का अवसर है और विश्वास का प्रतीक है। विश्व दुग्ध दिवस के अवसर पर आइए, हम दुग्ध क्षेत्र से जुड़े सभी कर्मयोगियों यथा पशुपालकों, वैज्ञानिकों, तकनीशियनों, डेयरी कर्मियों, परिवहनकर्ताओं, उद्यमियों और विक्रेताओं के योगदान को नमन करें तथा स्वस्थ, समृद्ध और पोषण-संपन्न भारत के निर्माण के संकल्प को और मजबूत बनाएं।

“विश्व दुग्ध दिवस” की हार्दिक शुभकामनाएं!!!

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