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रिलेशनशिप- कोई गाली दे, ठेस पहुंचाए तो क्या करें:जो स्वीकारेंगे नहीं, पलटकर देने वाले के पास जाएगी, सीखें इग्नोर करने की कला

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रिलेशनशिप- कोई गाली दे, ठेस पहुंचाए तो क्या करें:जो स्वीकारेंगे नहीं, पलटकर देने वाले के पास जाएगी, सीखें इग्नोर करने की कला

किसी ने हमें कुछ कह दिया या फिर कोई हमारी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया तो हम तुरंत ऑफेंड हो जाते हैं। आहत महसूस करने लगते हैं। यानी हमें उसकी बात का बुरा लगता है या मन को ठेस पहुंचती है। ऐसी स्थिति में हमारी खुशियां और गम दूसरे लोग तय करने लगते हैं। हमारा मूड भी दूसरों के नियंत्रण में चला जाता है। जरा-सी बात का बुरा लगा नहीं कि चेहरा उतर जाता है।

हालांकि ये स्थिति किसी भी स्वस्थ व्यक्ति के लिए ठीक नहीं है। एक्सपर्ट्स की मानें तो ऐसी स्थिति में मेंटल हेल्थ, प्रोडक्टिविटी, रिश्ते और ओवरऑल वेलबीइंग पर नकारात्मक असर पड़ता है।

तो फिर ऐसा क्या करें कि हमारी खुशियां और गम, दोनों की लगाम खुद हमारे हाथों में रहे। कोई और हमें आसानी से ऑफेंड न कर पाए। और अगर तमाम कोशिशों के बाद भी हम ऑफेंड हो ही जाएं तो हमें किस तरह रिएक्ट करना चाहिए।

आज ‘रिलेशनशिप’ कॉलम में इसी मुद्दे पर बात करेंगे और कुछ ऐसे टिप्स जानेंगे, जिनके सहारे खुद को आसानी से ऑफेंड होने से बचाया जा सकता है। साथ ही ऑफेंड होने की स्थिति में किस तरह से रिएक्ट करना हेल्दी होता है और इस दौरान कौन-सी हैबिट्स अनहेल्दी मानी जाती है, इसकी भी बात करेंगे।

कब कौन सा रास्ता चुनें
मान लीजिए, भरी महफिल में किसी ने कोई ऐसी बात कह दी, जिसे आप अपमानजनक मानते हैं और आपको उसकी बात का बुरा लग गया। साइकोलॉजी टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी स्थिति में लोग 5 तरीके से रिएक्ट कर सकते हैं। हालांकि ये पांचों रास्ते हेल्दी नहीं माने जाते। अलग-अलग रिश्ते और स्थिति के मुताबिक अलग-अलग राह चुनने की सलाह दी जाती है।

स्वीकार करना- किसी करीबी शख्स या शुभचिंतक की बात बुरी लगी हो तो यह रास्ता मददगार साबित हो सकता है। इसका मतलब है रचनात्मक आलोचना को स्वीकार करना और यह मानना कि उस व्यक्ति ने यह बात मेरे भले के लिए ही कही है। उदाहरण के लिए ऑफिस में गलत तरीके से काम करने पर बॉस की डांट या क्लास में टीचर की कही कड़वी बातों को स्वीकार करना ही सबसे बेहतर माना जाता है। यहां ऑफेंड होना, सच्चाई से मुंह मोड़ने जैसा हो सकता है।

इग्नोर करना- जब ऑफेंड करने वाला शख्स करीब के प्रोफेशनल या पर्सनल रिश्ते में न हो तो उसके ऑफेंसिव कमेंट को इग्नोर किया जा सकता है। विवाद को आगे बढ़ने से रोकने के लिए यह रास्ता सबसे बेहतर हो सकता है।

मजाक के बतौर लेना- अगर ऑफेंड करने वाला शख्स करीबी हुआ और उसकी बातें वाकई ऑफेंड करने वाली हों तो रिश्ते को बचाने और टकराव से बचने के लिए इग्नोर करने के अलावा उस बात को मजाक समझकर टालना भी एक हेल्दी विकल्प हो सकता है। ऐसी स्थिति में बात आई-गई हो जाती है।

गुस्सा करना- आमतौर पर यह सबसे कमजोर रास्ता माना जाता है। जब तक बाकी सभी रास्ते बंद न हों और ऑफेंड करने वाला शख्स चुप्पी को आपकी कमजोरी न समझे, इस रास्ते से दूर रहने की सलाह दी जाती है।

बदले में वैसा ही व्यवहार- साइकोलॉजी टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक किसी भी स्थिति में इस रास्ते को अपनाएं तो अपना ही नुकसान होगा। सामने वाला कितना भी टॉक्सिक हो या वह कितनी ही अपमानजनक बातें कहे, बदले में उसके जैसा व्यवहार करना खुद के लिए ठीक नहीं। ऐसी स्थिति में इग्नोर करना ही सबसे बेहतर उपाय बताया गया है।

जब लोग तय करें हमारा मूड तो नतीजे में मिलेगा सिर्फ दुख
न्यूयॉर्क टाइम्स बेस्ट सेलिंग राइटर और मोटिवेशनल स्पीकर मेल रॉबिन्स की मानें तो ‘लोगों को अपनी खुशियां या गम तय करने का मौका मत दीजिए। दूसरों से ज्यादा उम्मीद हमेशा दुख ही पहुंचाएगी। वे कुछ ऐसा करें, जिससे आपको दुख हो तो बस ‘जाने दीजिए’ यानी इग्नोर करिए। ऐसा करने से रिश्ते भी बेहतर रहेंगे और आपकी जिंदगी में खुशियां भी आएंगी।’

हम ऑफेंड क्यों होते हैं
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खुद को ऑफेंड होने से बचाने के लिए तमाम उपाय किए जा सकते हैं। लेकिन एक सवाल यह भी उठता है कि हम ऑफेंड होते ही क्यों हैं। मेल रॉबिन्स के मुताबिक जब दूसरे लोग हमारी धारणा के विपरीत कुछ बोलते या करते हैं तो ऑफेंड होने की आशंका होती है। इस भावना के पीछे असल सोच दूसरे लोगों से उम्मीद रखने की है। हम ऐसी उम्मीद करते हैं कि जमाना हमारे मुताबिक चले और वैसा ही व्यवहार करे और जब ऐसा नहीं होता, हमारे ऑफेंड होने की आशंका बढ़ जाती है।

ऑफेंड होने से बचना है तो ‘जाने दो’

बात जब ऑफेंसिव रवैए को इग्नोर करने और आगे बढ़ने की आए तो मेल रॉबिन्स की ‘लेट देम’ थ्योरी मददगार साबित हो सकती है। वैसे यह कोई साइंटिफिक थ्योरी या मैथ का फॉर्मूला नहीं है। आसान भाषा में कहें तो ‘लेट देम’ जो जैसा कर रहा है, उसे वैसा करने देने का आसान फलसफा है, जिसे जिंदगी में लागू करके बहुत सारे झमेलों से बचा जा सकता है।

यह थ्योरी बस हमारे सोचने की दिशा को दूसरों से खुद की ओर मोड़ती है। इसके मुताबिक दूसरों को बदलने की कोशिश से बेहतर है कि थोड़ी मात्रा में ही सही, ये कवायद खुद के लिए करें।

जमाने से ज्यादा उम्मीद न रखें। कोई दगा दे रहा हो, हमारे लिए गलत बोल रहा हो तो उसे दोस्ती, वफा और भाषा की समझाइश देने के बदले यह समझें कि उसकी सोच ही वैसी है और इसे बदलना हमारे वश में नहीं। ऐसे ही कोई कड़वी बातें कह जाए तो उसे भाषा की सीख देने की जगह किसी ऐसे शख्स से बात करें, जो मीठी बोली बोलता हो।

इस बात का ध्यान रखें कि बुरे इंसान को सबक सिखाना या दुनिया को सही रास्ते पर ले जाना हमारी-आपकी जिम्मेदारी नहीं है। इस सच्चाई को स्वीकारते हुए अपना अगला कदम बढ़ाना और खुद को इन झमलों से बचाना ही ‘लेट देम’ का निचोड़ है। ऐसी स्थिति में कोई हमें आसानी से ऑफेंड नहीं कर पाता और हमारा वेलबीइंग, हमारी खुशियां-गम हमारे हाथों में रहती हैं। जमाना उसे ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाता।

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