“अतृप्त भूख”

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क्यूँ तय होते है भूख के पैमाने?
जिसका कोई रूप नहीं होता है।
प्रेम की अतृप्त भूख दिखती नहीं,
बस महसूस होती है पल पल।

रोते बिलखते हुए अलग परिवार,
मिलन की अतृप्त आस लिए,
इंतजार करते हैं उस पल का,
उसका बेटा आएगा जंग जीत कर।

गरीब माँ के बच्चे की अतृप्त भूख,
जो भटकते है दर दर भोजन को,
माँ के आँचल को पकड़े हुए बच्चे,
पेट की अतृप्त आग में जलते हैं।

दीवार पर लगी तस्वीरों से प्रेम,
निहारती है आँखे अतीत को,
जार जार होती पत्थर जैसी काया,
महसूस करती हैं अतृप्त भूख को।

चूल्हें की आग जलती बुझती सी,
मिट्टी के तवे का आग से प्रेम।
पर महसूस करती वो जली राख,
इन सब के अतृप्त विरह दर्द को।

वो लेखिका को लेखनी से लगाव,
लेखनी का स्याही से अतृप्त भूख।
पन्नों का लिखे हुए शब्दों से प्रेम,
कभी कहाँ पूरी हुई अतृप्त भूख।

पेड़ों का फूलों से अगाध प्रेम,
ये जानते हुए बिछड़ेगें ये कभी।
फिर भी जब साथ है दोनों,
महसूस करते प्रेम की अतृप्त भूख।

नेताओं को सत्ता की अतृप्त भूख,
गरीबों को लूट धन की अतृप्त भूख।
बिके हुए ईमान पर हर पल धूर्तता,
अतृप्त लालच की भूख इन्हें रहती।

अगाध प्रेम पति पत्नि का बढ़ता है,
तब होती है और ज्यादा अपेक्षायें,
एक दूसरे के पहल के इंतजार में,
बढ़ती है इनके प्रेम की अतृप्त भूख।

भाई भाई में पिता की जायदाद में,
मन में ज्यादा पाने की अतृप्त भूख।
एक दूसरे को नीचा दिखाने की भूख,
कहाँ मिटती तृष्णा की अतृप्त भूख।

क्यूँ तय होते हैं भूख के पैमाने?
जिसका कोई रूप नहीं होता है।
प्रेम की अतृप्त भूख दिखती नहीं,
बस महसूस होती है पल पल।

स्वरचित और मौलिक रचना
पूजा गुप्ता मिर्जापुर उत्तर प्रदेश

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