जिंदगी (गीत) : स्वरचित एवं मौलिक कंचन वर्मा

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जिंदगी
(गीत )

लम्हा लम्हा घट रही,है यू कहां चल रही ज़िंदगी,
कभी शूल बनती या कभी फूल बन रही ज़िंदगी ।
लिखे हैं हमने तराने बहुत एक ज़िंदगी के नाम पे,
मुस्कराके कभी रुला के बदल रही है ये ज़िंदगी।
लम्हा लम्हा —————————-!
कभी मिले अपने तो बिछड़े है जीवन की सांझ से,
दुखते हुए पल हंसते हुए पल बीते है कुछ शान से।
खुद ही खुद की कहानी कोई लिख रही हैं जिंदगी,
एहसासों का उड़ते बादल सी बिखर रही है ज़िंदगी,
लम्हा लम्हा —————–!
कभी खास बन तो बिंदास बनके निखर गई जिंदगी ।
वफा है कही कही उलझन बनी प्रश्नों की कतार है,
ज़िंदगी भी क्या है भला ये तेज वक्त की रफ्तार हैं।
मिलती हैं कहीं संभलती है कहीं ढल रही यूं ज़िंदगी ।
लम्हा लम्हा———————।

स्वरचित एवं मौलिक
कंचन वर्मा
शाहजहांपुर
उत्तर प्रदेश

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