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दुश्मन से खतरा एक जैसा, फिर बीएसएफ और आर्मी के जवानों को अलग-अलग रिस्‍क अलाउंस क्‍यों? उठने लगे सवाल

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पुलवामा हमले के बाद गृह मंत्रालय ने नोटिफिकेशन जारी किया था। इसके चलते रिस्‍क और हार्डशिप की कैटेगरी में बदलाव हो गया। अभी एलएसी पर बीएसएफ और आर्मी जवानों को अलग-अलग रिस्‍क अलाउंस मिल रहा है।
नई दिल्ली
लाइन ऑफ कंट्रोल (LAC) पर तैनात सैनिक जब दुश्मन का मुकाबला करता है या कश्मीर घाटी में आतंकियो से मुठभेड़ होती है, तो क्या वर्दी के रंग के हिसाब से खतरा तय होता है? क्या अलग-अलग रंग की वर्दी में खतरे का स्तर अलग-अलग है? यह सवाल इसलिए क्योंकि पुलवामा अटैक के बाद गृह मंत्रालय की तरफ से जारी एक नोटिफिकेशन ने बीएसएफ सहित सभी सीएपीएफ (सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स) जवानों और भारतीय सेना के जवानों के बीच रिस्क और हार्डशिप की कैटेगरी बदल दी। भारतीय सेना के लिए जो जगह रिस्क और हार्डशिप में कम रिस्क वाली कैटेगरी में है। वही, सीएपीएफ के लिए ज्यादा रिस्क वाली कटैगरी में है। इसका असर रिस्क और हार्डशिप अलाउंस पर पड़ा है।
रिस्क और हार्डशिप की अलग कैटेगरी क्यों?
14 फरवरी 2019 को जब पुलवामा अटैक हुआ था उसके बाद 22 फरवरी 2019 को गृह मंत्रालय की तरफ से एक नोटिफिकेशन जारी किया गया। इसमें सीएपीएफ जवानों और अधिकारियों के लिए रिस्क और हार्डशिप की कैटेगरी बदली गई। जैसे रजौरी सेक्टर पहले R1H2 कैटेगरी में आता था तो उसे बदलकर R1H1 कैटेगरी में कर दिया गया, जो हार्डशिप के लिहाज से ज्यादा ऊपर की कैटेगरी है। इससे वहां तैनात सीएपीएफ के जवानों और अधिकारियों को मिलने वाला अलाउंस भी कैटेगरी के हिसाब से बढ़ गया। जबकि भारतीय सेना के लिए वह पुरानी कैटेगरी में ही रहा। R1H2 में अलाउंस जवानों के लिए 9700 रुपये और ऑफिसर्स के लिए 16900 रुपये है। R1H1 कैटेगरी में अलाउंस जवानों के लिए 17300 और ऑफिसर्स के लिए 25000 रुपये है। भारतीय सेना के एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि शोपियां, किश्तवाड़ या लाइन ऑफ कंट्रोल या ऐसी जगह को देखें जहां एक ही जगह पर सीएपीएफ के जवान भी तैनात हैं और भारतीय सेना के जवान भी। हमारे जवान पूछते हैं कि जब दोनों बराबर खतरा झेल रहे हैं तो हमें रिस्क और हार्डशिप अलाउंस उनसे कम क्यों मिलता है।
फाइनेंस में अटकी है फाइल
गृह मंत्रालय के नोटिफिकेशन के बाद भारतीय सेना ने भी इस संबंध में रक्षा मंत्रालय को प्रस्ताव भेजा। रक्षा मंत्रालय ने इसके लिए ट्राई सर्विस (आर्मी, नेवी, एयरफोर्स) कमिटी बनाई। जब चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का नया पद बना तो यह मामला भी मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स के तहत आ गया। कमिटी ने इस साल फरवरी में अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी जिसमें कहा गया कि सीएपीएफ की तरह आर्म्ड फोर्सेस के लिए भी रिस्क और हार्डशिप की वही कटैगरी होनी चाहिए। लेकिन, मामला फाइनेंस डिपार्टमेंट के पास अटका है।
सीएपीएफ भी उठाती रही है बराबरी का मसला
भारतीय सेना रिस्क और हार्डशिप अलाउंस का मसला दो साल से उठा रही है। लेकिन, सीएपीएफ भी सेना के साथ बराबरी का मसला काफी वक्त से उठाती रही है। बीएसएफ के एक रिटायर्ड सीनियर अधिकारी ने कहा कि एक ही रैंक में भारतीय सेना के मुकाबले बीएसएफ में सैलरी काफी कम है। अगर हम कमांडेंट का पद देखें तो वह सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल के बराबर ही यूनिट को कमांड करता है, लेकिन कमांडेंट की सैलरी सेना की सैलरी से कम से कम 20 पर्सेंट कम है। इसी तरह राशन अलाउंस जहां सेना के लिए टैक्स फ्री है वहीं, बीएसएफ या सीएपीएफ को इस पर टैक्स देना होता है। भारतीय सेना से रिटायर होने के बाद पेंशन मिलती है। वहीं, 2004 के बाद सीएपीएफ में शामिल हुए लोगों को रिटायर होने के बाद पेंशन नही मिलती।

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