बिश्नोई समाज पर्यावरण संरक्षण का प्रेरणा पुंज – डॉ फारुख अब्दुल्ला

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बीकानेर। अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा मुकाम और जाम्भाणी साहित्य अकादमी बीकानेर के तत्वावधान में दुबई में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ फारुख अब्दुल्ला ने कहा कि पर्यावरण चेतना और युक्ति- मुक्ति की संदेश वाहिनी गुरु जाम्भोजी की सबदवाणी और जाम्भाणी संत कवियों की वाणी जहां भी जाती है पर्यावरण संरक्षण की अलख जगाती है। अगर विश्व का पर्यावरण बचाना है तो यह वाणी विश्व के कोने कोने में फैलनी चाहिए। बिश्नोई समाज का पांच सौ सालों का इतिहास बताता है कि इस प्रकृति पोषक समाज ने पर्यावरण को बचाने के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया है। इस समाज के संतों ने केवल उपदेश ही नहीं दिया बल्कि क्रियान्वयन करने का आदेश भी दिया और वे आमजन के साथ मिलकर इस महान आंदोलन के सहभागी भी बने। आज विश्व को इस समाज से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पूर्व सांसद और बिश्नोई महासभा के संरक्षक बिश्नोई रत्न चौधरी कुलदीप बिश्नोई ने कहा कि मुझे गर्व की मैं ऐसे गौरवशाली इतिहास वाले समाज की सर्वोच्च संस्था के संरक्षक रूप में सेवा कर रहा हूँ। 15 वीं शताब्दी में अनेक महान विभूतियों का आगमन भारत भूमि पर हुआ, जिन्होंने भारत की पददलित,शोषित,भयाक्रांत और सोई हुई चेतना में नवजीवन का संचार कर दिया। उन्होंने आध्यात्मिक क्रांति के साथ-साथ अभूतपूर्व सामाजिक परिवर्तन भी किया। उन दिव्य पुञ्जों में श्री गुरु जंभेश्वर भगवान का नाम परम आदर के साथ लिया जाता है। आध्यात्मिक जगत में उनका उपदेश पर्यावरण चेतना के कारण अपना विलक्षण स्थान रखता है। उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा कि प्राण देकर भी पर्यावरण की रक्षा करो। उनके द्वारा प्रवर्तित बिश्नोई पंथ उत्तर भारत पहला संत संप्रदाय है। पंथ में यह बातें विशेषता से प्रचलित है कि- ‘सिर सांटे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण’- ‘सिर कटवाकर भी अगर वृक्ष कटने से बचता है तो यह सौदा सस्ता है।’ ‘जांडी हिरण संहार देख, वहां सिर दीजिए’- ‘वृक्ष और वन्यजीवों को मरते-कटते देखकर उनकी रक्षा में अपने प्राण दे देने चाहिए।’ यह केवल निरा उपदेश और बातें ही प्रचलित नहीं है, पंथ के पिछले पांच सौ वर्षों के इतिहास में सैकड़ों लोगों ने इनके लिए अपना बलिदान भी दिया है। सन् 1730 ई. राजस्थान के जोधपुर जिले के खेजड़ली ग्राम में वृक्षों की रक्षा के लिए 363 बिश्नोईयों ने सामूहिक बलिदान दिया। वृक्ष रक्षा के लिए यह विश्व का अद्वितीय बलिदान था। इस बलिदान स्थल पर उन शहीदों की याद में विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला लगता है।भारत सरकार ने वन्यजीवों की रक्षा करते हुए दो बिश्नोई नवयुवकों को मरणोपरांत शौर्य चक्र देकर भी सम्मानित किया है। केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारें इन शहीदों के नाम पर पर्यावरण सरंक्षण के लिए काम करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को प्रतिवर्ष पुरस्कार देकर सम्मानित करती है आज के समय में परहित के लिए प्राणों की बाजी लगा देने वाले ऐसे उदाहरण अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।
कार्यक्रम को विशिष्ट अतिथि पंजाब सरकार के पूर्व मंत्री राणा गुरमीत सिंह सोढ़ी , पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय सिंह,,विधायक सलिल बिश्नोई ,फ़िल्म स्टार विवेक ओबराय, पूर्व विधायक श्रीमती रेणुका बिश्नोई ने संबोधित किया व पर्यावरण से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे ।अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के अध्यक्ष देवेंद्र बुडिया ने सभी का स्वागत करते हुए सम्मेलन की पृष्ठभूमि पर विस्तार से प्रकाश डाला । जाम्भाणी साहित्य अकादमी की अध्यक्षा डॉ इंद्रा बिश्नोई ने सम्मेलन के उदेश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु जम्भेश्वर जी की पर्यावरणीय शिक्षओं का वैश्विक स्तर पर प्रचार प्रसार करना है ताकि विश्व इन लोक कल्याणकारी शिक्षाओं को ग्रहण करके पर्यावरण संकट से निज़ात पा सके । सम्मेलन के संयोजक रमेश बाबल ने सभी का स्वागत करते हुए सम्मेलन की रूपरेखा पर प्रकाश डाला । गौम्बूक की मैनेजिंग डायरेक्टर टांटिया अन्टोल्ली ने खेजड़ी वृक्ष के पर्यावरणीय महत्त्व पर प्रकाश डाला व बिश्नोई समाज के पर्यावरणीय प्रेम को प्रेरणादायक बताया । इस दो दिन तक चलने वाले सम्मेलन में विभिन्न देशों के 600 प्रतिभागी भाग ले रहे है । दो दिनों में आठ सत्रों में 60 से अधिक पर्यावरणविद पर्यावरण से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत करेंगे ।।

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