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भारतीय साहित्य मानवता का पक्षधर और समग्रता में मूल्यांकन का हामी है : डॉ. उमाकांत गुप्त एवं राजेन्द्र जोशी

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हिन्दी पत्रकारिता की मूल आत्मा साहित्यिकता- सांस्कृतिकता ही है : अनिल सक्सेना

राजस्थान के साहित्यिक आंदोलन की श्रृंखला में साहित्यिक परिचर्चा सम्पन्न

बीकानेर। राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम के तत्वावधान में शनिवार को
भारतीय साहित्य, संस्कृति और मीडिया‘ विषय पर परिचर्चा का आयोजन रानी बाजार स्थित होटल मरुधर पैलेस में आयोजित की गई।
राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम के जिला अध्यक्ष डाॅ. नासिर जैदी ने बताया कि वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार श्री अनिल सक्सेना के संयोजन में आयोजित कार्यक्रम में सभी वक्ताओं ने साहित्य-संस्कृति में पत्रकारों की भूमिका पर एक से बढ़कर एक विचार रखे। मुख्य वक्ता आलोचक डाॅ. उमाकांत गुप्ता ने कहा कि भारतीय साहित्य मानवता का पक्षधर और समग्रता में मूल्यांकन का हामी है। विचारों की स्वतन्त्र अभिव्यक्ति और मौलिकता नवीनता का गायक रहा है। भारतीय संस्कृति मूल्यानपेक्ष जीवन पद्धति का पर्याय रही तथा स्वंय को सुधारने पर बल देती है। आज हम पोपूलर संस्कृति के उत्पाद होकर रह गए हैं। चुनौतियों को मनोतियों का रूप होकर रह गए है। यह चिन्ता का कारक है। संवेदना को जगाकर अपनी जड़ों से जुड़कर मानवता का हित रचेंगें तो बचेंगें।
कार्यक्रम संयोजक वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार अनिल सक्सेना ने कहा कि हिन्दी पत्रकारिता की मूल आत्मा साहित्यिकता- सांस्कृतिकता ही है । उन्होंने कहा कि प्रदेशभर में राजस्थान के साहित्यिक आंदोलन की श्रृंखला के तहत पत्रकारिता-साहित्यिक कार्यक्रम किये जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में साहित्य और मीडिया का समन्वय स्थापित होना जरूरी है।
साहित्य और संस्कृति का स्थान घटता जा रहा है।सोशल मीडिया बेलगाम है। विचार गोष्ठी में मुख्य अतिथि राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के कोषाध्यक्ष कवि-कथाकार राजेन्द्र जोशी ने कहा कि साहित्य भारतीय साहित्य दर्शन पर आधारित है और संस्कृति हमारी परंपराओं को जीवित रखती है, उन्होंने कहा कि बदलते दौर में मीडिया बेजा तरीके से बदल रहा है जिससे हमारी संस्कृति और दर्शन पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है । जोशी ने कहा की दुनिया भर में भारतीय दर्शन और संस्कृति की पहचान सदियों से रही है।
वरिष्ठ व्यंगकार-सम्पादक डाॅ.अजय जोशी ने कहा कि संस्कृति,साहित्य एवं मीडिया समाज के अभिन्न अंग है। इनका समाज के प्रति महत्वपूर्ण उत्तर दायित्व है। आज के दौर में मीडिया मुख्य रूप से सोशल मीडिया इस दायित्व के विमुख है। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में साहित्य और संस्कृति का स्थान घटता जा रहा है।सोशल मीडिया बेलगाम है।विशिष्ट अतिथि राजाराम स्वर्णकार ने कहा साहित्य समाज को जोड़ता है, संस्कृति से समाज आगे बढ़ता है औऱ मीडिया लोकतंत्र की जान होती है। तीनों के मिलने से एक सुसंकृत देश-समाज का निर्माण होता है। वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नासिर जैदी ने कहा साहित्य-संस्कृति से देश विकसित होता है। हमारे संस्कारों ने हमें धर्म संस्कृति को पोषित पल्लवित करने का ज्ञान दिया है।
परिचर्चा में कवयित्री-आलोचक डाॅ. रेणुका व्यास ‘नीलम’ ने कहा कि साहित्य में संवेदनात्मक अन्वेषण को मीडिया को रेखांकित करना चाहिए।
साहित्यकार संगीता सेठी ने कहा कि भारतीय साहित्य और संस्कृति के मूल्य बनाये रखने में मीडिया का योगदान है ।
वरिष्ठ पत्रकार अशोक माथुर , आध्यात्मिक गुरु दीपक गोस्वामी, पत्रकार हेम शर्मा, साहित्यकार जुगल पुरोहित, रवि पुरोहित, डाॅ. बसंती हर्ष, शंशाक शेखर जोशी, असद अली असद, पूर्णिमा मित्रा, मुकेश व्यास, अनिल व्यास, मोहनलाल जागिंड,भवानी जोशी, श्याम मारु, नीरज जोशी, विपल्व व्यास सहित अनेक महानुभावो ने विचार रखे।
इससे पहले स्वागत उद्बोधन वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नासिर ज़ैदी ने दिया, कार्यक्रम संचालन मोनिका गौड़ ने किया, सरस्वती वंदना ज्योति वधवा रंजना ने की ।
कार्यक्रम में मुहम्मद रफ़ीक़ पठान, घनश्याम सिंह, मधुरिमा सिंह, नीरज जोशी, असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सोफ़िया ज़ैदी, डॉ. जगदीश बारहठ, शकूर बीकाणवी, वरिष्ठ रंगकर्मी बी.एल नवीन, कृष्ण लाल बिश्नोई, एच. एस. गिल, जगदीश रतनू, डॉ. बसन्ती हर्ष, सुधा आचार्य, एम. एल. जांगीड़, शिव शंकर शर्मा, अनिल व्यास, डॉ. संगीता सेठी, हेम शर्मा, दिनेश सक्सेना, प्रेस क्लब अध्यक्ष भवानी जोशी, वरिष्ठ पत्रकार श्याम मारू, रवि पुरोहित, मुकेश व्यास, चन्द्र शेखर जोशी, ज्योति स्वामी, रवि माथुर, जुगल किशोर पुरोहित, शशांक शेखर जोशी, विक्रम जागरवाल, धीरज जोशी, महेन्द्र मेहरा, शंकर सारस्वत, अंजुमन आरा, डॉ. एल. के. कपिल, सैयद रईस अली साहित्यकार, पत्रकार और नगर के प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।

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