रमक झमक में होगा ‘म्हारी गणगौर उत्सव’…

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परम्परा संस्कृति में योगदान के लिए
‘गणगौर संस्कृति अलंकरण’

बीकानेर। रमक झमक परिसर में शनिवार और रविवार दो दिवसीय ‘म्हारी गणगौर उत्सव’ का आयोजन होगा। रमक झमक के अध्यक्ष प्रहलाद ओझा ‘भैरुं’ ने बताया कि दो दिवसीय की उत्सव के के दौरान बालिकाओं एवं महिलाओं द्वारा गवर के पारम्परिक गीतों की प्रस्तुतियां के साथ पारम्परिक नृत्य प्रस्तुत होंगे । वहीं शहर की महिलाओं की गणगौर मंडली द्वारा गणगौर से संबंधित सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी जाएगी। लक्ष्मी ओझा ने बताया कि वर्तमान में आधुनिक युग में गणगौर पूजन’ पर परिचर्चा होगी । महिलाओं द्वारा गणगौर पर केंद्रित रचनाएं पढ़ी जाएगी । बुजुर्ग महिलाओं द्वारा गणगौर पूजन संस्मरण सुनाए जायेंगें।
दो दिवसीय उत्सव के दौरान बालिकाओं और महिलाओं द्वारा गणगौर का दांतिया देने, गणगौर निर्माण करने,रंग रोगन,श्रंगार करने,कपड़े सिलने,साफा बनाने,आभूषण बनाने,गवर को सजाने संवारने एवं पारम्परिक गवर गीत गाने,गणगौर नृत्य, घुड़ला घुमाने,गणगौर ईसर का स्वरूप धारण करने,कुएं पर पानी की रस्म में योगदान देने,मथेरन आर्ट गणगौर तैयार करने वाली महिलाओं तथा खाश कर महिला गणगौर गीत गाने वाली मंडलियों को ‘गणगौर सस्कृति अलंकरण सम्मान प्रदान किया जाएगा।इसके साथ ही गणगौर पर विशिष्ट करने वाली महिलाओं का भी सम्मान किया जाएगा। सम्मान स्वरूप उन्हें सम्मान पत्र,श्रीफल और रमक झमक ओपरणा ,म्हारी गणगौर पुस्तक एवं मोमेंटो दिया जाएगा।

गणगौर संस्कृति अंलकरण सम्मान 2026 चयन समिति में रचनाकार ज्योति स्वामी एवं शिवानी शर्मा को शामिल किया गया है।

दो दिवसीय आयोजन में गणगौर का पूजन आरती एवं खोल की रस्म भी होगी।


परम्परा संस्कृति के संरक्षण के लिए
ऐसे आयोजन

आज कल फिल्म, सीरियल और आधुनिक गीत चल रहे है। वहीं टीवी और खासकर मोबाइल में सब व्यस्त रहते है। भागम भाग जीवन के इस दौर में महिलाएं सम्पूर्ण घर के काम की जिम्मेदारी निभाती है,वर्तमान युग में जॉब भी करती है ऐसे व्यस्तता और जीवन की आपाधापी में गणगौर की प्राचीन परम्परा संस्कृति कहीं कम न हो जाए इसलिए प्रोत्साहन और प्रेरणा के उद्देश्य से रमक झमक ने यह आयोजन शुरू किया। ओझा बताते है कि महिलाओं का प्रमुख त्यौहार है गणगौर! जिसका पुरुष मंडलियों ने गणगौर गीत गा कर महत्व बढ़ाया है लेकिन ऐसे ही गणगौर गीत गाने वाली महिला मण्डलीयां भी बने और जो बनी हुई है उनको प्रोत्साहन एवं सम्मान मिले।

ओझा बताते है कि शहर की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रखने तथा उसका व्यापक प्रचार करना ही उनका उद्देश्य है।-प्रहलाद ओझा भैरूं

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