वैदिक हैरिटेज में पाण्डुलिपि प्रदर्शनी एवं लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला का भव्य शुभारंभ

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वैदिक हैरिटेज में पाण्डुलिपि प्रदर्शनी एवं लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला का भव्य शुभारंभ

जयपुर, 10 मार्च – राजस्थान संस्कृत अकादमी, जयपुर स्थित वैदिक हैरिटेज एवं पाण्डुलिपि शोध संस्थान में सोमवार को भव्य समारोह के साथ पाण्डुलिपि प्रदर्शनी एवं लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर विश्वगुरु महामण्डलेश्वर परमहंस स्वामी महेश्वरानंद पुरी जी ने दीप प्रज्ज्वलन कर और अश्वमेध यज्ञ की प्राचीन पाण्डुलिपि का विमोचन कर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया।

भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण पर जोर

समारोह में स्वामी महेश्वरानंद पुरी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा का आधार प्राचीन पाण्डुलिपियाँ हैं, जिनमें हजारों वर्षों पुराना ज्ञान संकलित है। उन्होंने पाण्डुलिपियों के संरक्षण और उन्हें जनमानस तक पहुँचाने के लिए डिजिटल रूप में संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया। स्वामी जी ने इस आयोजन को भारतीय इतिहास और संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया।

उनके उत्तराधिकारी, प्रखर वक्ता स्वामी अवतार पुरी जी ने भारतीय ज्ञान परंपरा के वैश्विक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृत ग्रंथों और पाण्डुलिपियों में संकलित ज्ञान को आधुनिक तकनीक के माध्यम से पूरी दुनिया तक पहुँचाया जाना चाहिए, ताकि भारतीय संस्कृति को नई पहचान मिले और अगली पीढ़ी इस गौरवशाली धरोहर से जुड़ सके।

पाण्डुलिपियों के डिजिटलीकरण की पहल

महामण्डलेश्वर स्वामी ज्ञानेश्वर पुरी जी ने लुप्त होती प्राचीन पाण्डुलिपियों के डिजिटलीकरण का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि “इन पाण्डुलिपियों में विज्ञान, गणित, चिकित्सा, धर्म और संस्कृति से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी संकलित है। यदि इन्हें डिजिटल स्वरूप में संरक्षित किया जाए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह एक अनमोल धरोहर होगी।”

विद्वानों का सम्मान

कार्यक्रम में राजस्थान संस्कृत अकादमी की निदेशक डॉ. लताश्री माली ने विद्वानों को सॉल, श्रीफल एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। उन्होंने कहा कि “संस्कृत भाषा और पाण्डुलिपियों के संरक्षण के लिए सभी को एकजुट होकर कार्य करना होगा।”

कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ने प्रशिक्षण कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि “इस कार्यशाला के माध्यम से विद्वानों को विभिन्न प्राचीन लिपियों के अध्ययन एवं उनके अनुवाद की विधियाँ सिखाई जाएँगी।”

प्रदर्शनी में दुर्लभ पाण्डुलिपियों का अनावरण

पाण्डुलिपि प्रदर्शनी अधिकारी जयप्रकाश शर्मा ने आगंतुकों को दुर्लभ पाण्डुलिपियों का दर्शन कराया और उनकी ऐतिहासिकता एवं प्राचीनता के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस प्रदर्शनी में विभिन्न युगों की संस्कृत, प्राकृत, ब्राह्मी एवं शारदा लिपियों में लिखी गई पाण्डुलिपियाँ प्रदर्शित की गई हैं।

इस अवसर पर संस्कृत जगत के अनेक विद्वान, शोधार्थी एवं संस्कृति प्रेमी उपस्थित थे। इस आयोजन को संस्कृत भाषा और पाण्डुलिपियों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति एवं प्राचीन ज्ञान का लाभ मिल सकेगा।

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