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आखि़र क्यों इस्तेमाल करती है यूक्रेनी सेना युद्ध के मोर्चे पर “ॐ” और स्वस्तिक पैच का निशान

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REPORT BY DEFENCE JOURNALIST SAHIL

यूक्रेनी सेना ने युद्ध के मोर्चे पर इस्तेमाल की “ॐ” और स्वस्तिक पैच

कीव: यूक्रेनी सेना ने हाल ही में अपने सैनिकों के यूनिफॉर्म पर धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक “ॐ” और स्वस्तिक का प्रयोग किया है, जिससे विश्वभर में विभिन्न प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। यह कदम खासतौर पर एक विवादास्पद मोर्चे पर सैन्य मनोबल को बढ़ावा देने और सांस्कृतिक पहचान को दर्शाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग:

“ॐ” और स्वस्तिक जैसे प्रतीकों का उपयोग भारतीय और अन्य एशियाई संस्कृतियों में धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के रूप में किया जाता है। “ॐ” को हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में एक पवित्र ध्वनि और ब्रह्मा के उच्चतम स्वरूप के रूप में माना जाता है, जबकि स्वस्तिक को शुभता और समृद्धि के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

यूक्रेनी सेना ने इन प्रतीकों को अपने युद्ध के ध्वज और सैनिकों के यूनिफॉर्म पर शामिल करके यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे अपनी सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक सहिष्णुता का सम्मान करते हैं। इसे लेकर यूक्रेनी सेना का कहना है कि यह कदम सैनिकों के मनोबल को ऊंचा रखने और उन्हें एकजुट रखने के उद्देश्य से उठाया गया है।

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ:

इस निर्णय पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आई हैं। कुछ लोग इसे सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता के प्रति सम्मान के रूप में देख रहे हैं, जबकि अन्य इसे विवादास्पद मानते हैं। विशेषकर, स्वस्तिक को कुछ देशों में नकारात्मक दृष्टिकोण के साथ जोड़ा जाता है, जहां यह नाज़ी प्रतीक के रूप में भी पहचाना जाता है। हालांकि, यूक्रेनी सेना ने इस प्रतीक के संदर्भ में स्पष्ट किया है कि वे इसके सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व को ही सम्मानित कर रहे हैं और इसका कोई अन्य नकारात्मक संदर्भ नहीं है।

सैन्य रणनीति और मनोबल:

यूक्रेनी सेना के प्रवक्ता ने इस पहल के पीछे के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा, “हमारा लक्ष्य सैनिकों को एक सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान देने का है, ताकि वे अपने कार्यों में और भी प्रेरित और एकजुट महसूस करें। यह प्रतीक उन्हें अपनी जड़ों से जोड़े रखने में मदद करेगा और उनके मनोबल को बढ़ाएगा।”

विवाद और आलोचना:

यूक्रेन के इस कदम पर विवाद भी उठ रहे हैं। कुछ आलोचक मानते हैं कि धार्मिक प्रतीकों का सैन्य उपयोग संवेदनशील मुद्दों को जन्म दे सकता है और इससे सांस्कृतिक या धार्मिक असहमति हो सकती है। वहीं, कुछ लोगों का कहना है कि सैन्य प्रतीकों और सांस्कृतिक प्रतीकों के बीच अंतर को समझना आवश्यक है और इस प्रकार के प्रयोग को उचित संदर्भ में देखना चाहिए।

अंतिम विचार:

यूक्रेनी सेना का यह निर्णय सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों के उपयोग को लेकर वैश्विक समुदाय में नए विमर्श को जन्म दे सकता है। यह देखा जाना बाकी है कि इस निर्णय के दीर्घकालिक प्रभाव क्या होंगे और यह अन्य देशों की सेनाओं और सैन्य प्रथाओं को किस प्रकार प्रभावित करेगा।

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ER. SAHIL PATHAN

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