
बीकानेर। पर्यावरण संरक्षण और प्लास्टिक मुक्त वातावरण की दिशा में एक सराहनीय पहल करते हुए पर्यावरण प्रेमियों द्वारा मंदिर परिसर में पत्तल–दोना के उपयोग को बढ़ावा देने का अभियान चलाया गया। शिव मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के हाथों में पॉलिथीन की थैलियां देखकर पर्यावरण टीम ने उन्हें प्राकृतिक विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित किया और पूजा-अर्चना, प्रसादी तथा धार्मिक सामग्री पत्तों से बने पत्तल–दोना में लेकर आने का संदेश दिया।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने बताया कि पत्तल–दोना पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक रूप से नष्ट होने वाले होते हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ प्रदूषण मुक्त जीवनशैली को बढ़ावा देते हैं। प्लास्टिक और थर्माकोल के उपयोग से जहां पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचता है, वहीं पत्तों से बने ये पारंपरिक बर्तन प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार पत्तल–दोना स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सुरक्षित माने जाते हैं, क्योंकि इनमें किसी प्रकार के हानिकारक रसायन नहीं होते और गरम भोजन परोसने में भी यह सुरक्षित विकल्प हैं। धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी इनका विशेष महत्व है। विवाह, भंडारा, पूजा-पाठ और पारंपरिक आयोजनों में पत्तल–दोना का उपयोग शुभ माना जाता है और यह भारतीय परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
अभियान से जुड़े लोगों ने बताया कि उपयोग के बाद पत्तल–दोना को धोने की आवश्यकता नहीं होती, इन्हें सीधे खाद या मिट्टी में मिलाया जा सकता है। यदि यह खुले में भी पड़े रहें तो सखुआ (साल) वृक्ष के पत्तों से बने होने के कारण पशुओं, विशेषकर गायों के लिए भी यह उपयोगी होते हैं।
पर्यावरण टीम ने देवस्थान विभाग के अधिकारियों से भी आग्रह किया है कि मंदिरों में प्रसाद और पूजा सामग्री ले जाने के लिए पत्तल–दोना का उपयोग अनिवार्य किया जाए, ताकि प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण के साथ पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिल सके।
इस जागरूकता अभियान में पर्यावरण प्रेमी राकेश शर्मा के नेतृत्व में नरेंद्र शर्मा, अरुण सोलंकी, एसपी पाठक, सुमित शर्मा सहित कई लोगों ने सहयोग किया।













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