जयपुर में 21 दिवसीय लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारंभ, पांडुलिपि संरक्षण पर दिया गया विशेष जोर

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जयपुर। भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत संस्कृति मंत्रालय, ज्ञान भारतम् मिशन, भारत सरकार से संबद्ध क्लस्टर केन्द्र विश्वगुरुदीप आश्रम शोध संस्थान, जयपुर एवं पण्डित मोतीलाल जोशी प्राच्य विद्या अनुसंधान केन्द्र, शाहपुरा बाग के संयुक्त तत्वावधान में 21 दिवसीय (120 घंटे) लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारंभ सोमवार को राजस्थान शिक्षक प्रशिक्षण विद्यापीठ, शाहपुरा बाग में किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ महामंडलेश्वर स्वामी ज्ञानेश्वर पुरी जी महाराज के सान्निध्य में दीप प्रज्वलन एवं अतिथियों के माल्यार्पण के साथ हुआ। उद्घाटन सत्र में संस्था सचिव डॉ. राजकुमार जोशी ने अपने स्वागत संबोधन में पांडुलिपियों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ये हमारे प्राचीन ज्ञान की अमूल्य धरोहर हैं, जिनका संरक्षण और संवर्धन भविष्य के शोध कार्यों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

कार्यक्रम के दौरान लिपि एवं पाण्डुलिपि विशेषज्ञ जयप्रकाश शर्मा ने कार्यशाला की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि यह प्रशिक्षण न केवल शैक्षणिक बल्कि व्यावहारिक दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी है। उन्होंने कहा कि पांडुलिपियां हमारे पुरातन ज्ञान और आधुनिक ज्ञान के बीच सेतु का कार्य करती हैं। उन्होंने पांडुलिपियों के अध्ययन की वैज्ञानिक विधियों और उनके उपयोग की प्रक्रिया पर भी विस्तार से जानकारी दी। साथ ही बताया कि पिछले एक माह में ही राजस्थान में लगभग 13 लाख पांडुलिपियों का सर्वेक्षण किया जा चुका है, जो इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

इस अवसर पर विश्वगुरुदीप आश्रम शोध संस्थान की ओर से संस्था सचिव डॉ. राजकुमार जोशी, विद्यापीठ प्राचार्य डॉ. मनीषा शर्मा एवं विभागाध्यक्ष डॉ. सुभद्रा जोशी को प्रमाण पत्र एवं पुस्तक भेंट कर सम्मानित किया गया।

अतिथि वक्ता डॉ. संतोष शर्मा (प्रवक्ता, राधागोविंद राजकीय महाविद्यालय, कंवर नगर) ने अपने संबोधन में कार्यशाला के शैक्षिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्जीवन का महत्वपूर्ण माध्यम है।

कार्यक्रम के समापन चरण में विद्यापीठ प्राचार्य डॉ. मनीषा शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह कार्यशाला ज्ञान के मार्ग पर एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि पांडुलिपियों के माध्यम से हमारे समृद्ध प्राचीन ज्ञान को पुनः प्रतिष्ठित किया जा सकता है, अतः इनके संरक्षण की दिशा में सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं, जिससे भारत पुनः विश्वगुरु के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर सके।

कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में कुल 98 प्रशिक्षणार्थियों ने भाग लिया, जिन्हें ज्ञान भारतम् के सर्वे एप को डाउनलोड कर प्रशिक्षण प्रदान किया गया, ताकि वे अपने आसपास एवं दूरस्थ क्षेत्रों में उपलब्ध पांडुलिपियों की जानकारी इस एप के माध्यम से साझा कर सकें।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. कविता भारद्वाज द्वारा किया गया तथा अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

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