नई दिल्ली, 9 मई 2026 . साहित्य अकादेमी द्वारा आज रवीन्द्रनाथ ठाकुर के जन्मदिन पर साहित्य मंच कार्यक्रम आयोजित किया गया.
कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्य अकादेमी के अंग्रेजी परामर्श मंडल की संयोजक मालाश्री लाल ने की और मंदिरा घोष, निर्मल कांति भट्टाचार्जी एवं प्रयाग शुक्ल ने अपने विचार व्यक्त किये. कार्यक्रम के आरंभ में सबका स्वागत अंगवस्त्रम एवं पुस्तकें भेंट करके साहित्य अकादेमी के कार्यकारी सचिव एन. सुरेश बाबु ने किया.
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में मालाश्री लाल ने कहा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मानवतावाद में शिक्षा एक महत्त्वपूर्ण बिंदु था इसीलिए उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना की. उन्होंने रवीन्द्रनाथ द्वारा स्त्रियों को पुरुषों के बराबर का दर्जा दिए जाने को भी इसी मानवतावाद का हिस्सा माना. आगे उन्होंने कहा कि रवीन्द्रनाथ ने विश्व युद्ध को पश्चिमी सभ्यता की असफलता माना था लेकिन इतना सब कुछ होते हुए भी उन्हें मानवता पर विश्वास था. मंदिरा घोष ने कहा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का लिखा आज भी मानवता पर हमारे विश्वास को बनाए रखने में सहायक है . उनकी कविताओं और दूसरे लेखन में लगातार मानवतावाद झलकता है. मानवता के लिए ही उन्होंने गांधी के अस्पृश्यता मूलक आंदोलन का समर्थन किया था. उनके लेखन में सभी धर्म का सम्मान था और शिक्षा को इसके लिए वह एक बड़ा साधन मानते थे . निर्मल कांति भट्टाचार्जी ने कहा कि वह मानवता को केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रखना चाहते थे बल्कि वह इसे हमारे सामूहिक व्यवहार में लाना चाहते थे. उन्होंने इसके सूत्र भारतीय उपनिषदों से ढूंढे थे. वह मानवता केवल मनुष्य के बीच ही नहीं प्रकृति के साथ भी चाहते थे. उनका विश्वास था कि पृथ्वी के साथ हमारा प्रेम दुनिया में परिवर्तन लाएगा. उन्होंने उस समय में अंतरराष्ट्रीय भाईचारे की कल्पना की थी जो बहुत सार्थक थी. प्रयाग शुक्ल ने उनकी कविताओं का जिक्र करते हुए कहा कि मनुष्यता और प्रकृति के प्रति उनकी गहरी आस्था थी. उनका आम लोगों से संबंध ही उनकी मानवता का सूत्र था. उनकी कविताओं में बाजार, घाट ,मोहल्ले सब हमें दिखाई देते हैं. उन्होंने मानवता के उस हर पहलू पर विचार किया जो मानवता को संरक्षित रख सकते थे. ठाकुर ने मानवतावाद को जीव जंतुओं और प्रकृति से जोड़ा.
कार्यक्रम के बाद सवाल -जवाब सत्र में उनके रविंद्र संगीत और खासकर पर उनकी यात्राओं की चर्चा हुई जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि देश और विदेश की ये यात्राएँ भी मानवतावाद की खोज के संबंध में ही थी. कार्यक्रम के अंत में साहित्य अकादेमी के कार्यकारी सचिव एन. सुरेश बाबु ने धन्यवाद ज्ञापित किया.
कार्यक्रम का संचालन कार्यक्रम अधिकारी पंकज सेठ ने किया.



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