ब्राह्मी लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला का समापन, 700 से अधिक प्रतिभागियों ने जाना भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्व

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बीकानेर। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के ज्ञान भारतम् मिशन के स्वतंत्र केंद्र अभय जैन ग्रंथालय, बीकानेर द्वारा आयोजित सात दिवसीय ऑनलाइन ब्राह्मी लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला का समापन समारोह 26 मई को गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। 20 मई से 26 मई तक आयोजित इस कार्यशाला में देशभर से 700 से अधिक प्रतिभागियों ने सहभागिता कर भारतीय प्राचीन लिपियों एवं पांडुलिपि परंपरा के अध्ययन के प्रति विशेष रुचि दिखाई।

समापन समारोह के कार्यक्रम अध्यक्ष प्रो. सोमदेव शतांशु ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया तथा प्राचीन लिपियों एवं पांडुलिपियों के अध्ययन को सांस्कृतिक विरासत संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।

मुख्य अतिथि प्रो. बसंत कुमार एम. भट्ट ने व्याकरण, पांडुलिपि विज्ञान एवं भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि भारतीय पांडुलिपियों में निहित ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुँचाना समय की आवश्यकता है तथा लिपि अध्ययन इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

कार्यक्रम के मार्गदर्शक प्रो. कीर्ति कांत शर्मा ने अपने आशीर्वचन में कार्यशाला की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए भारतीय प्राचीन लिपियों के संरक्षण एवं अध्ययन को राष्ट्रीय दायित्व बताया।

कार्यशाला की प्रशिक्षक डॉ. सुकेता ने प्रतिभागियों को ब्राह्मी लिपि का व्यावहारिक एवं सैद्धांतिक प्रशिक्षण प्रदान किया। प्रशिक्षण में ब्राह्मी लिपि परिचय, उद्गम एवं विकास, भाषा-लिपि एवं वर्णमाला परिचय, स्वर-व्यंजन लेखन, बारहखड़ी अभ्यास तथा संयुक्त अक्षरों की पहचान जैसे विषयों पर विस्तार से अध्ययन कराया गया।

विशिष्ट वक्ता डॉ. सुरेंद्र कुमार शर्मा ने ज्ञान भारतम् मिशन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हुए बताया कि किस प्रकार पांडुलिपियों के संरक्षण, सर्वेक्षण एवं अध्ययन से जुड़कर भारत की ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखा जा सकता है। वहीं जय प्रकाश शर्मा ने भी भारतीय पांडुलिपि परंपरा एवं प्राचीन लिपियों के महत्व पर विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम के समन्वयक ऋषभ नाहटा रहे। उन्होंने समापन अवसर पर सभी अतिथियों, प्रशिक्षकों, प्रतिभागियों एवं सहयोगियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएँ युवाओं को भारतीय संस्कृति एवं प्राचीन ज्ञान परंपरा से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन रही हैं।

कार्यक्रम का सफल संचालन मोहित बिस्सा एवं लव कुमार देराश्री ने किया। सह-संयोजक लक्ष्मीकांत उपाध्याय एवं गौरव आचार्य ने व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया।

समापन अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि ब्राह्मी लिपि भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल आधारशिला है तथा इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम भारतीय सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण एवं संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

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