राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति का साहित्यकार समारोह सम्पन्न

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कागज से स्क्रीन तक बदली सृजन की दुनिया : संवेदना बचाए रखना चुनौती-‌ डुकवाल
कृत्रिम बुद्धिमत्ता शब्दों को सजा सकती है, पर किसी अनुभव की धड़कन मनुष्य ही दे सकता है-दुगड़
सृजन सम्मान व पुरस्कार अर्पित। कागज से स्क्रीन तक की सृजन की दुनिया पर संगोष्ठी

श्रीडूॅंगरगढ़/बीकानेर
राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति द्वारा संस्कृति भवन में साहित्यकार समारोह सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए कोटा कृषि विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. विमला डुकवाल ने कहा कि कागज से स्क्रीन तक पहुँचा साहित्य केवल माध्यम का परिवर्तन नहीं, मनुष्य की पढ़ने और सोचने की आदतों का परिवर्तन भी है। तकनीक ने शब्दों को गति और विस्तार दिया है, लेकिन साहित्य की असली शक्ति आज भी उसके ठहराव और संवेदना में है। डुकवाल ने कहा कि हमें यह तय करना होगा कि स्क्रीन की तेज रोशनी हमारी अंतर्दृष्टि को धुंधला न कर दे और सूचना के शोर में साहित्य की आवाज दब न जाए।
संस्थाध्यक्ष श्याम महर्षि ने संस्था की गतिविधियों को विस्तार से साझा करते हुए कहा कि आज हमारी सबसे बड़ी चुनौती शब्दों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना नहीं, बल्कि उन्हें इतने गहरे पहुँचाना है ताकि पाठक कुछ क्षण ठहरकर स्वयं से मिल सके।
मुख्य वक्ता डाॅ. मदन गोपाल लढ़ा ने कहा कि सृजन की दुनिया में कागज से लेकर स्क्रीन तक का सफर बहुवर्णी तथा बहुआयामी है। निश्चय ही तकनीक के प्रसार से रचना और कला के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया है। रचनाधर्मियों को तकनीक का सदुपयोग करते हुए इसके नकारात्मक प्रभावों से लेखन को बचाना होगा तभी संवेदनशील और संस्कारित समाज का निर्माण संभव होगा।
मुख्य अतिथि जैन विश्व भारती संस्थान, लाडनूं के कुलपति प्रो. बच्छराज दुगड़ ने कहा कि माध्यम चाहे कागज हो या स्क्रीन, सृजन की अंतिम कसौटी यही है कि वह मनुष्य को भीतर से कितना छू पाता है। स्क्रीन ने हमारे हाथ में संसार दे दिया, पर साहित्य का काम अब भी हमें अपने भीतर का संसार दिखाना है।
वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी व साहित्यकार डाॅ. सूरज सिंह नेगी ने समारेाह को सम्बोधित करते हुए कहा कि कभी शब्द कागज पर उतरकर पाठक तक पहुँचते थे, आज स्क्रीन पर आते ही दुनिया में फैल जाते हैं, लेकिन मन तक पहुँचने की दूरी अब भी उतनी ही है।
समारोह के प्रारम्भ में समारोह की रूपरेखा साझा करते हुए संस्था सचिव साहित्यकार रवि पुरोहित ने कहा कि सृजन का असली घर न कागज है, न स्क्रीन। उसका घर मनुष्य का मन है। माध्यम बदलते रहेंगे, उपकरण बदलते रहेंगे, पढ़ने और लिखने की आदतें बदलती रहेंगी, लेकिन मनुष्य की जरूरत-किसी दूसरे मनुष्य द्वारा समझे जाने की, अपनी अनुभूति और समय को अर्थ देने की बनी रहेगी।
साहित्यश्री से समादृत वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. मधुकांत ने शब्द की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए कहा कि आज प्रश्न यह नहीं कि कागज बचेगा या स्क्रीन। प्रश्न यह है कि शब्दों की आत्मा बचेगी या नहीं। सफल व सरस संचालन कवयित्री भगवती पारीक ‘मनु’ ने किया। समारोह में महावीर माली, विजय महर्षि, भवानी-कांति उपाध्याय, विनोद सिखवाल, पंकज बिंदिया ओझा, प्रशांत बिस्सा, रामचन्द्र राठी, बजरंग शर्मा, मदन सैनी, महावीर सारस्वत, डाॅ. चेतन स्वामी, भरतसिंह राठौड़, मनमोहन कल्याणी, ओम गुरावा, गोपीराम नाई, डाॅ. विनोद सुथार, नगरपालिका उपाध्यक्ष विनोद गिरी गुसांई, सत्यनारायण योगी, दयाशंकर शर्मा, अम्बिका डागा, रेणु प्रजापत, तमन्ना झाबक, मधु झाबक, पूर्व पालिकाध्यक्ष मानमल शर्मा, गिरधारी सिंधी, विमल भाटी सहित अनेक सम्भागियों ने भाग लिया।
इनका हुआ सम्मान
मधुकांत, रोहतक को मलाराम माली स्मृति साहित्यश्री सम्मान, डाॅ. सूरजसिंह नेगी, जयपुर को डाॅ. नन्दलाल महर्षि स्मृति हिन्दी सृजन पुरस्कार, डी.पी. पचीसिया, बीकानेर को रामकिशन उपाध्याय स्मृति समाज सेवा सम्मान, श्रीमती मीरा जैन, उज्जैन को शिवप्रसाद सिखवाल स्मृति महिला लेखन पुरस्कार, डाॅ. सतीश कुमार, किशनगढ़ को सुरेश कंचन ओझा लेखन पुरस्कार, श्री अरविंद पथिक, गाजियाबाद को श्री चन्द्रमोहन हाड़ा हिमकर स्मृति उपन्यास लेखन पुरस्कार और लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, बस्ती को श्याम सुन्दर नागला स्मृति बाल साहित्य पुरस्कार अर्पित किये गये।

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