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सलूंबर कलेक्टर सबसे तेज, 11 मिनट में निपटा रहे फाइल:चित्तौड़गढ़ कलेक्टर को लगते हैं 22 घंटे 22 मिनट, दो पति IAS पत्नियों से आगे

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सलूंबर कलेक्टर सबसे तेज, 11 मिनट में निपटा रहे फाइल:चित्तौड़गढ़ कलेक्टर को लगते हैं 22 घंटे 22 मिनट, दो पति IAS पत्नियों से आगे

जयपुर

राजस्थान में नवगठित जिलों में तैनात कलेक्टर सबसे तेज गति में फाइलों का निपटारा कर रहे हैं। हाल ही में सरकार ने ई-फाइलिंग सिस्टम में प्रदेश के 47 जिलों के कलेक्टरों की रैंकिंग जारी की है।

इसमें सलूंबर कलेक्टर सबसे तेज हैं, वे अपने कार्यालय में आने वाली एक फाइल 11 मिनट में निपटा रहे हैं। वहीं तीन जिलों के कलेक्टरों को फाइल निपटाने में 22 घंटे तक लग रहे हैं। कई IAS कपल भी अलग-अलग जिलों में बतौर कलेक्टर काम कर रहे हैं, उनमें से 2 अफसर अपनी पत्नियों से आगे हैं।

अफसरों की जवाबदेही बनाने के लिए ई-फाइलिंग सिस्टम की शुरुआत का असर तो दिख रहा है, लेकिन कुछ कलेक्टरों के बीच इसे लेकर असंतोष भी व्याप्त हो रहा है।

हाल ही में जारी की गई लिस्ट में फाइल निपटाने के मामले में प्रदेश के टॉप 10 कलेक्टर।

हाल ही में जारी की गई लिस्ट में फाइल निपटाने के मामले में प्रदेश के टॉप 10 कलेक्टर।

टॉप-10 जिले और उनके कलेक्टर

टॉप-10 जिलों में पहली बार बनने वाले 7 जिले सलूंबर, शाहपुरा, ब्यावर, केकड़ी, सांचौर, गंगापुर सिटी और खैरथल-तिजारा शामिल हैं। इनमें से भी तीन जिले सलूंबर, शाहपुरा और सांचौर लगातार टॉप-1, 2, 3 स्थान पर है।

रैंक- 1. जसमीत सिंह संधू, सलूंबर : संधू मात्र 11 मिनट में एक फाइल निपटा रहे हैं। वे पहले नवगठित जिले फलोदी में कलेक्टर थे, हाल ही में सलूंबर लगाए गए हैं। सलूंबर भी पहली बार जिला बना है।

रैंक- 2. राजेंद्र सिंह शेखावत, शाहपुरा : आरएएस से प्रमोट होकर आईएएस बने शेखावत पहले करौली जिला कलेक्टर रह चुके हैं। वे 21 मिनट में एक फाइल का निस्तारण कर रहे हैं।

शाहपुरा कलेक्टर राजेंद्र सिंह शेखावत रैंकिंग में दूसरे नंबर पर हैं।

शाहपुरा कलेक्टर राजेंद्र सिंह शेखावत रैंकिंग में दूसरे नंबर पर हैं।

रैंक- 3. शक्ति सिंह राठौड़, सांचौर : सांचौर नया जिला बना है और राठौड़ भी पहली बार कलेक्टर बने हैं। कलेक्टर राठौड़ 45 मिनट में एक फाइल निपटा रहे हैं।

रैंक- 4. प्रकाश राजपुरोहित, जयपुर : जयपुर से पहले विभिन्न जिलों के कलेक्टर रह चुके हैं। जयपुर जिले का प्रदेश में सबसे बड़ा कार्यक्षेत्र है। राजपुरोहित 53 मिनट में एक फाइल निपटा रहे हैं।

रैंक- 5. गौरव सैनी, गंगापुर सिटी : गंगापुर सिटी भी पहली बार जिला बना है। कलेक्टर सैनी 56 मिनट में एक फाइल निपटा रहे हैं। सैनी पहली बार कलेक्टर बने हैं।

रैंक- 6. उत्सव कौशल, ब्यावर : नवगठित जिलों में ब्यावर सबसे बड़ा जिला है। कौशल पहली बार कलेक्टर बने हैं। वे 59 मिनट में एक फाइल निपटा रहे हैं।

रैंक- 7. रविंद्र गोस्वामी, कोटा : एक घंटे एक मिनट में एक फाइल निपटा रहे हैं। हाल ही में कोटा में कोचिंग छात्रों को आत्महत्या से रोकने के लिए उनकी लिखी चिट्ठियों की देशभर में चर्चा हुई थी।

कोटा कलेक्टर रविंद्र गोस्वामी लगातार सेमिनार और वन टू वन मीटिंग के जरिए स्टूडेंट्स को मोटिवेट कर रहे हैं।

कोटा कलेक्टर रविंद्र गोस्वामी लगातार सेमिनार और वन टू वन मीटिंग के जरिए स्टूडेंट्स को मोटिवेट कर रहे हैं।

रैंक- 8. अंकित कुमार सिंह, डूंगरपुर : केंद्र सरकार से तीन बार विभिन्न योजनाओं में अच्छा कार्य करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हो चुके हैं अंकित। अंकित इससे पहले तीन जिलों में कलेक्टर रह चुके हैं। वे एक घंटे 5 मिनट में एक फाइल निपटा रहे हैं।

रैंक- 9. अर्तिका शुक्ला, खैरथल-तिजारा : पहले नवगठित जिले दूदू में कलेक्टर बनाई गई थीं। अब वे खैरथल-तिजारा की कलेक्टर हैं। शुक्ला एक घंटे 5 मिनट का समय लेकर एक फाइल निपटा रही हैं।

रैंक- 10. श्वेता चौहान, केकड़ी : केकड़ी भी नवगठित जिला है और चौहान भी पहली बार कलेक्टर बनी हैं। वे एक घंटे 8 मिनट के समय में एक फाइल निपटा रही हैं।

पति से पीछे रहीं कलेक्टर पत्नी
फाइल निपटाने के मामले में जसमीत सिंह संधू जहां पहले नंबर पर हैं, वहीं उनकी पत्नी अर्तिका शुक्ला 9वें नंबर पर रहीं। संधू सलूंबर और अर्तिका खैरथल-तिजारा में कलेक्टर हैं। इसी तरह 8वें नंबर पर रहे डूंगरपुर के कलेक्टर अंकित कुमार सिंह की पत्नी अंजलि राजोरिया 43वें नंबर पर रहीं। अंजलि की ओर से एक फाइल निपटाने का औसतन समय 8 घंटे 33 मिनट आया है। अंजलि राजोरिया प्रतापगढ़ जिले में कलेक्टर हैं।

जसमीत सिंह संधू और उनकी पत्नी अर्तिका शुक्ला दोनों ही टॉप-10 कलेक्टर्स में शामिल हैं।

जसमीत सिंह संधू और उनकी पत्नी अर्तिका शुक्ला दोनों ही टॉप-10 कलेक्टर्स में शामिल हैं।

तीन कलेक्टर सबसे पीछे, रेड लिस्ट में शामिल
47 जिलों के कलेक्टरों में से 3 कलेक्टर का फाइल निपटाने का काम मुख्य सचिव सुधांश पंत के स्तर पर काफी नाराजगी वाला रहा है। इन तीनों जिला कलेक्टरों को रेड लिस्ट में शामिल किया गया है।

रेड लिस्ट को ब्यूरोक्रेसी में चिंताजनक स्थिति की लिस्ट माना जाता है। यह तीन जिले हैं राजसमंद, बीकानेर और चित्तौड़गढ़। इन तीनों जिलों में भंवरलाल, नमृता वृष्णि और आलोक रंजन कलेक्टर हैं। इनमें से भंवरलाल 13 घंटे 22 मिनट, नमृता 15 घंटे 2 मिनट और रंजन 22 घंटे 22 मिनट का समय लेकर एक फाइल निपटा रहे हैं।

11 से लेकर 25 तक की रैंकिंग के जिला कलेक्टर ग्रीन सूची में शामिल

ग्रीन सूची जिसे ठीक-ठाक माना जाता है, उसमें टॉप-10 के बाद 11 से लेकर 25 तक की रैंकिंग मिली है। इन कलेक्टरों को एक फाइल निपटाने में औसतन एक घंटे 34 मिनट से लेकर 3 घंटे 51 मिनट तक का समय लग रहा है।

इनमें 11 वें नंबर पर झालावाड़ के कलेक्टर अजय सिंह राठौड़ हैं। उन्हें एक फाइल निपटाने में एक घंटे 34 मिनट का समय लगा है। उनके बाद 25 नंबर तक क्रमश: शुभम चौधरी (सिरोही), श्रीनिधि (धौलपुर), सौम्या झा (टोंक), अवधेश मीणा (अनूपगढ़), देवेंद्र कुमार (दौसा), बालमुकुंद असावा (डीडवाना), कल्पना अग्रवाल (बहरोड़), लोकबंधु (श्रीगंगानगर), रोहिताश सिंह तोमर (बारां), कुशाल यादव (सवाईमाधोपुर), चिन्मई गोपाल (झुंझुनूं), आशीष गुप्ता (अलवर), कमर अल जमान (सीकर) और सुशील कुमार (बालोतरा) शामिल हैं।

25 से 44 के बीच खराब है टाइमिंग
25 वें नंबर पर अजमेर की कलेक्टर हैं । वे 4 घंटे 5 मिनट में एक फाइल निपटा रही हैं। उनके बाद 44 वें नंबर तक जो कलेक्टर हैं, वे 4 घंटे से लेकर 9 घंटे 47 मिनट तक का समय औसतन एक फाइल में लगा रहे हैं। यह हैं क्रमश: अक्षय गोदारा (बूंदी), नीलाभ सक्सेना (करौली), लक्ष्मीनारायण (पाली), गौरव अग्रवाल (जोधपुर), अमित यादव (भरतपुर), शरद मेहरा (नीमकाथाना), नमित मेहता (भीलवाड़ा), कानाराम (हनुमानगढ़), अरुण कुमार पुरोहित (नागौर), निशांत जैन (बाड़मेर), प्रताप सिंह (जैसलमेर), हरजीलाल अटल (फलोदी), पुष्पा सत्यानी (चूरू), अरविंद पोसवाल (उदयपुर), पूजा कुमारी (जालोर), श्रुति भारद्वाज (डीग), अंजलि राजोरिया (प्रतापगढ़) और इंद्रजीत यादव (बांसवाड़ा)।

रैंकिंग में 45 से 47 नंबर पर रहे कलेक्टर्स को रेड लिस्ट में शामिल किया गया है।

रैंकिंग में 45 से 47 नंबर पर रहे कलेक्टर्स को रेड लिस्ट में शामिल किया गया है।

क्या है ई-फाइलिंग सिस्टम और सीएस पंत इस सिस्टम पर क्यों जोर दे रहे हैं

ई-फाइलिंग सिस्टम के तहत कोई भी अधिकारी खासकर जिला कलेक्टर किसी फाइल को कब तक बिना फैसला किए खुद के पास रोकता है, इस बात की जानकारी मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री को सीधे तौर पर पहुंचती है। उदाहरण- मान लीजिए किसी अधीनस्थ अधिकारी ने 10 मई 2024 को दोपहर 2 बजे किसी फाइल को कलेक्टर के पास भेजा, तो कलेक्टर के स्तर पर वो फाइल कब और कितने बजे वापस निकलेगी इसका समय और तारीख दोनों सिस्टम पर दर्ज होंगी।

अगर किसी फाइल पर सामान्यतः: दो मिनट या 10 मिनट में फैसला हो सकता हो और उसे कोई अधिकारी अपने पास लेकर बैठा रहे तो इस पर उसे टोका जाना आसान होता है। उसकी कार्यप्रणाली लेटलतीफी की है, इसे कंप्यूटर के जरिए सत्यापित किया जा सकता है।

सीएस सुधांश पंत इसलिए इस सिस्टम पर जोर दे रहे हैं कि फाइलों को रोकना, बेवजह ज्यादा समय तक दबाए बैठे रहना और उन पर समय पर निर्णय नहीं करना उचित नहीं है। इसलिए उन्होंने अपने औचक निरीक्षणों के दौरान अधिकारियों की टेबल पर पड़ी फाइलों की खुद मोबाइल से फोटो खींची थीं।

2 जिला कलेक्टरों की आईडी से हो गई थी चूक
सीएस पंत के निर्देश हैं कि कलेक्टरों को फाइल निपटाने का काम अपने ही लेपटॉप पर अपनी ही आईडी के साथ स्वयं करना है। कोई कलेक्टर अपने लॉग-इन और आईडी को किसी अधीनस्थ अधिकारी-कर्मचारी को नहीं सौंपे।

पाली और खैरथल जिलों में कलेक्टर के नाम से पिछले दिनों कुछ ऐसे आदेश जारी हो गए थे, जो उन्होंने जारी किए ही नहीं थे। ऐसे में सीएस पंत के स्तर पर यह निर्देश दिए गए थे। यही कारण है कि कलेक्टर अब टेबल वर्क से बंध से गए हैं। उन्हें सामान्य से सामान्य शिकायत पत्रों, आवेदनों आदि को भी खुद ध्यान से देखना और तय समय में निपटाना होता है।

फील्ड वर्क हो रहा प्रभावित
फाइलों के निस्तारण पर ज्यादा जोर दिए जाने से जिलों में कलेक्टर के स्तर पर फील्ड वर्क, निरीक्षण, दौरे, रात्रि चौपाल, सुनवाई जैसे कार्य प्रभावित हो रहे हैं। कुछ कलेक्टरों का कहना है कि फाइल निपटाना भी महत्वपूर्ण है, लेकिन फील्ड वर्क जिला कलेक्टर के कार्यों में सबसे खास होता है।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट
पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव पी. एन. भंडारी (आईएएस) का कहना है कि ई-फाइलिंग सिस्टम बहुत अच्छा है। इससे किस फाइल पर कोई अधिकारी फैसला लेने में कितना समय ले रहा है, यह तय होता है। ब्यूरोक्रेसी के काम में कई तरह की फाइलें होती हैं। एक कागज पर मान लीजिए किसी ने छोटे-मोटे लाइसेंस या कार्यक्रम आयोजन की इजाजत मांगी है, तो यह भी एक तरह से फाइल ही होती है। अब इसे कोई कलेक्टर अगर एक दो मिनट से ज्यादा समय लेकर निस्तारण करे तो कैसे काम चलेगा?

हर महत्वपूर्ण फाइल ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर तक विभिन्न चरणों से गुजरती है। कोई बड़ा प्रोजेक्ट या बड़ी समस्या है। उससे संबंधित फाइल है, तो गंभीरता से पढ़ना जरूरी है। उसमें एक फाइल में एक घंटा या दो घंटे भी कम पड़ सकते हैं, तब जाकर कोई निर्णय होगा। उच्च पदस्थ अफसरों को यह देखना चाहिए कि कौन कलेक्टर कितनी अवधि में किस तरह की फाइल पर निर्णय करता है। सभी फाइलों के औसत से तो आंकलन गड़बड़ हो सकता है। पेंडेंसी नहीं रहनी चाहिए, यह जरूर तय किया जाना चाहिए।

पूर्व आईएएस अफसर एम. पी. वर्मा का कहना है कि पूरे सिस्टम में एक विशेष सुधार की जरूरत है। कलेक्टरों का जो काम है वो फाइल पर भी उतना ही जरूरी है, जितना फील्ड में। फाइलों के निस्तारण में तेजी लाने से लोगों को सीधे राहत मिलती है। अगर फाइलों पर फैसले तेजी से नहीं होंगे, तो लोगों के काम अटके रहेंगे। कलेक्टरों को यह काम तेजी से ही करना चाहिए।

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