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राजस्थान की 12 सीटों पर कहां है कांटे की टक्कर:कहीं राम मंदिर तो कहीं जातीय समीकरण का मुद्दा; जानें कौन सी सीट पर क्या है स्थिति

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राजस्थान की 12 सीटों पर कहां है कांटे की टक्कर:कहीं राम मंदिर तो कहीं जातीय समीकरण का मुद्दा; जानें कौन सी सीट पर क्या है स्थिति

जयपुर

प्रदेश में 19 अप्रैल (शुक्रवार) को पहले चरण के मतदान होने हैं। पहले फेज की 12 सीटों पर (श्रीगंगानर, बीकानेर, चूरू, नागौर, झुंझुनूं, सीकर, जयपुर, जयपुर ग्रामीण, अलवर,भरतपुर, दौसा, करौली- धौलपुर) में इस बार का चुनाव काफी रोचक है। नागौर और चूरू हॉट सीट बनी हुई है।

इनके अलावा कहीं पर राम मंदिर का मुद्दा है तो कहीं पर जातीय समीकरण कैंडिडेट की जीत का कारण बन रही हैं। मतदान से पहले टीम प्रदेश की इन 12 सीटों पर पहुंची और जाना वोटर का मिजाज।

पढ़िए पहले चरण की इन सीटों का हाल…

जयपुर शहर : राम मंदिर और हिंदू वोटों की लामबंदी

जयपुर शहर की सीट पर बीजेपी ने दिग्गज नेता रहे भंवरलाल शर्मा की बेटी मंजू शर्मा को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस ने पहले सुनील शर्मा को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन उनके आरएसएस समर्थक संस्था के मंच पर जाने के पुराने वीडियो से उठे विवाद के बाद उन्होंने टिकट लौटा दिया। कांग्रेस ने बाद में पूर्व मंत्री प्रतापसिंह खाचरियावास को उम्मीदवार बनाया। इस विवाद से कांग्रेस को परसेप्शन के मोर्चे पर काफी नुकसान उठाना पड़ा।

समीकरणों के हिसाब से यहां बीजेपी को मजबूत माना जा रहा है। शहरी सीट होने के कारण राम मंदिर, हिंदुत्व और मोदी फैक्टर हावी है। अल्पसंख्यक इलाकों में कांग्रेस का दावा मजबूत है, लेकिन शहर में हिंदू वोटर्स को बीजेपी लामबंद कर रही है। जयपुर लोकसभा सीट में 8 विधानसभा सीटों में से 6 पर बीजेपी काबिज है। कांग्रेस केवल किशनपोल और आदर्श नगर सीट जीत पाई थी। लोकसभा में भी समीकरण वही है।

जयपुर ग्रामीण : कांग्रेस-बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर

जयपुर ग्रामीण सीट पर बीजेपी ने पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष राव राजेंद्र सिंह को टिकट दिया है। कांग्रेस ने सचिन पायलट समर्थक युवा नेता अनिल चोपड़ा को उम्मीदवार बनाया है। इस सीट पर कांग्रेस-बीजेपी के बीच कड़ी ​टक्कर दिख रही है।

राव राजेंद्र सिंह को बीजेपी के मजबूत कैडर का समर्थन और राम मंदिर के मुद्दे की वजह से शहर-कस्बों में फायदा हो रहा है। कांग्रेस उम्मीदवार को युवा और नए चेहरे का फायदा होता दिख रहा है। ग्रामीण इलाकों में जातीय फैक्टर की वजह से समीकरण अनिल चोपड़ा के पक्ष में है। जातीय गोलबंदी भी यहां रिजल्ट तय करेगी।

जयपुर ग्रामीण में विधानसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस-बीजेपी कड़ी टक्कर में थी। जयपुर ग्रामीण की आठ विधानसभा सीटों में से 4 पर कांग्रेस और 4 पर बीजेपी जीती थी। विधानसभा चुनाव की तुलना में कई सीटों पर समीकरण बदले हैं।

दौसा : सियासी-जातीय समीकरणों में मुरारी मजबूत

दौसा सीट पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला है। कांग्रेस ने दौसा से विधायक मुरारीलाल मीणा को टिकट दिया है, जबकि बीजेपी ने बस्सी से पूर्व विधायक कन्हैया लाल मीणा को मैदान में उतारा है।

दौसा सीट पर उम्मीदवार के हिसाब से मुरारीलाल मीणा को मजबूत माना जा रहा है। कन्हैया लाल मीणा अब तक बस्सी से बाहर सक्रिय नहीं रहे। गुर्जर, मीणा, दलित और मुस्लिम वोटर्स के समीकरणों की वजह से कांग्रेस का पक्ष मजबूत दिख रहा है, लेकिन भीतरघात की भी आशंका है। बीजेपी में डॉ. किरोड़ीलाल मीणा फैक्टर भी अहम रहेगा। मुरारीलाल मीणा, सचिन पायलट खेमे के नेता हैं। पायलट ने भी इस सीट पर पूरी ताकत लगा रखी है। शुक्रवार को पीएम मोदी के रोड शो के बाद भाजपा की उम्मीदें बढ़ गई हैं।

विधानसभा चुनाव में समीकरण बीजेपी के पक्ष में थे, लेकिन लोकसभा चुनाव में समीकरण बदले हुए हैं। जातीय और स्थानीय समीकरण बीजेपी के पक्ष में उतने नहीं हैं, जितने विधानसभा चुनाव के वक्त थे। दौसा लोकसभा क्षेत्र में आठ में से 5 विधानसभा सीटें बीजेपी को मिली थीं। बस्सी, थानागाजी, दौसा सीटें कांग्रेस के पास हैं। दौसा ऐसी लोकसभा सीट है, जिसमें तीन जिलों (जयपुर, अलवर और दौसा) की विधानसभा सीटें आती हैं।

भरतपुर : जाट आंदोलन तय करेगा हवा का रुख

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले और लोकसभा क्षेत्र भरतपुर में पिछले दो बार से बीजेपी कब्जा जमा रही है। इस बार क्षेत्र की 8 विधानसभा सीटों में से 5 भाजपा के खाते में हैं। बयाना की निर्दलीय विधायक ऋतु बनावत ने भाजपा को समर्थन दे रखा है। भरतपुर शहर की सीट आरएलडी के पास है, जो इस बार बीजेपी के साथ गठबंधन में है।

भरतपुर सीट पर जाट आरक्षण आंदोलन की हवा बह रही है। क्षेत्र में करीब 5 लाख जाट वोटर्स हैं। ओबीसी में शामिल करने को लेकर जाटों में बीजेपी के प्रति नाराजगी है। इसका असर वोट बैंक पर भी पड़ सकता है। वहीं, इस लोकसभा क्षेत्र में करीब 3.50 लाख जाटव वोटर्स हैं, जो एक बड़ा वर्ग है। कांग्रेस कैंडिडेट संजना इसी समाज से हैं। वहीं, कोली समाज के करीब 70 हजार वोट हैं।

मूल रूप से भुसावर की रहने वाली संजना जाटव कठूमर से महज 409 वोटों से विधानसभा चुनाव हार गई थीं। लेकिन, क्षेत्र में प्रियंका गांधी के अभियान ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ में संजना ने काफी काम किया था। इससे उनकी पकड़ मजबूत हुई है।

उधर, भाजपा प्रत्याशी रामस्वरूप कोली बयाना (अब भरतपुर) सीट से लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं। उन्हें कांग्रेस की महिला चेहरे के सामने क्षेत्र में बीजेपी की मजबूती और ब्लॉक लेवल पर टीम का सहारा है।

करौली-धौलपुर : बीजेपी-कांग्रेस में कांटे की टक्कर

करौली सीट पर एससी और एसटी वोटर काफी निर्णायक स्थिति में रहते हैं। सांसद मनोज राजोरिया का टिकट काट कर भाजपा ने इंदु देवी को प्रत्याशी बनाया है। इंदु देवी करौली की रहने वाली हैं और प्रधान रह चुकी हैं। लोगों से उनका सीधा जुड़ाव रहा है। करौली क्षेत्र में इंदु देवी को इसका फायदा मिलेगा।

भजनलाल जाटव भी दो बार विधायक और एक बार मंत्री रह चुके हैं। लेकिन, करौली में जनता अभी उन्हें सहज स्वीकार नहीं कर पा रही, क्योंकि वे रहने वाले भरतपुर जिले के हैं। वे धौलपुर क्षेत्र की चारों विधानसभा सीटों पर मजबूत स्थिति में रह सकते हैं।

जानकारों की मानें तो यहां एससी-एसटी वोटर निर्णायक स्थिति में रहते हैं। दोनों ही मजबूत प्रत्याशी हैं, लेकिन दोनों एक ही जाति से आते हैं। इसलिए जाटवों का वोट बैंक बंटेगा। एक करौली क्षेत्र में मजबूत है तो दूसरा धौलपुर में। इसलिए दोनों के बीच में कड़ी टक्कर लग रही है।

हालांकि करौली-धौलपुर की 8 विधानसभा सीट में से 5 पर कांग्रेस, 1 पर बसपा और 2 पर भाजपा है। बीजेपी यहां मजबूत नहीं है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि करौली में पीएम मोदी की सभा के बाद माहौल बदल सकता है।

बीकानेर : मजबूत दिख रहे मेघवाल

बीकानेर में इस बार भी बीजेपी ने मौजूदा कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल को ही अपना प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस ने उनके सामने राजस्थान सरकार में मंत्री रहे गोविंदराम मेघवाल को उतारा है।

गोविंदराम मेघवाल हाल में खाजूवाला सीट से विधानसभा चुनाव हार गए थे। अर्जुनराम मेघवाल लगातार 3 बार से सांसद बन रहे हैं।

वर्तमान में यहां बीजेपी मजबूत दिख रही है। हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में यहां बीजेपी को लोकसभा क्षेत्र की 8 विधानसभा में से 6 सीटों पर जीत मिली थी। विधानसभा चुनावों से सबक लेते हुए कांग्रेस ने यहां अपने बागी जाट नेताओं को दुबारा से अपने साथ कर लिया है।

श्रीगंगानगर : मजबूत दिख रहीं प्रियंका

श्रीगंगानगर सीट पर बीजेपी ने अपना प्रत्याशी बदलकर चौंकाया है। भाजपा ने इस बार यहां से 4 बार के सांसद निहालचंद मेघवाल का टिकट काट अनूपगढ़ नगर परिषद की सभापति प्रियंका बैलान को प्रत्याशी बनाया है।

कांग्रेस ने कुलदीप इंदौरा को प्रत्याशी बनाया है। इंदौरा श्रीगंगानगर जिला प्रमुख भी हैं और राजनीतिक परिवार से आते हैं। इंदौरा अनूपगढ़ विधानसभा से 2 बार विधायक का चुनाव भी लड़ चुके हैं। दोनों ही बार हार का सामना करना पड़ा था।

BJP प्रत्याशी प्रियंका बैलान का ससुराल अरोड़वंश समुदाय में है। कांग्रेस उनके जनरल कैटेगरी वाले परिवार की बहू होने का मुद्दा जोर-शोर से उठा रही है। कांग्रेस का दावा है कि एससी रिजर्व सीट पर भी बीजेपी जनरल प्रत्याशी का कब्जा करवाना चाहती है।

प्रियंका बैलान की नामांकन रैली में BJP MLA गुरवीर बराड़ और जिलाध्यक्ष शरणपाल सिंह के बीच मंच पर खुलेआम प्रदेशाध्यक्ष सीपी जोशी के सामने हुई नोकझोंक से पार्टी की गुटबाजी भी सामने आ गई थी। हालांकि बाद में इसे ठीक करने की कवायद की गई थी।

सीकर : भाजपा की हैट्रिक में कांग्रेस-सीपीएम का गठबंधन चुनौती

सीकर लोकसभा सीट पर खास चर्चा है- ‘ जहां से कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा खुद आते हैं, उस सीट पर कांग्रेस को गठबंधन क्यों करना पड़ा।’

सीकर सीट पर कांग्रेस ने सीपीएम प्रत्याशी अमराराम को समर्थन दिया है। वहीं भाजपा ने दो बार से इस सीट पर जीत रहे सुमेधानन्द सरस्वती को ही तीसरी बार मौका दिया है।

दोनों प्रत्याशियों को देखें तो साफ है कि भाजपा और कांग्रेस गठबंधन ने सामाजिक समीकरणों को भी साधने का प्रयास किया है।

सुमेधानंद की बात करें तो जातीय समीकरण के साथ अल्पसंख्यक वर्ग से भी एक धड़ा उनके पक्ष में खड़ा दिखाई दे रहा है।

सीपीएम के अमराराम सातवीं बार मैदान में हैं। पिछले 6 लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। अमराराम, धोद और दांतारामगढ़ से विधायक रह चुके हैं। दांतारामगढ़ सीट से लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुके हैं।

झुंझुनूं : होगी कांटे की टक्कर

झुंझुनूं लोकसभा भी उन सीटों में शामिल है, जहां कांग्रेस और भाजपा में अच्छी टक्कर होगी। भाजपा से शुभकरण चौधरी और कांग्रेस से विधायक बृजेंद्र ओला मैदान में हैं।

शेखावाटी में ओला परिवार की राजनीतिक विरासत का प्रभाव है। बृजेंद्र के पिता शीशराम ओला इसी सीट से 1996 से 2009 तक लगातार सांसद रहे थे।

ओला और चौधरी के जरिए दोनों बड़ी पार्टियों ने सामाजिक समीकरणों को भी साधने का प्रयास किया है। भाजपा ने 2019 में तत्कालीन सांसद संतोष अहलावत का टिकट काट कर नरेंद्र कुमार को मौका दिया था।

पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें, तो कांग्रेस ने इस लोकसभा क्षेत्र में शामिल 8 में से 6 जीती थीं। ऐसे में कांग्रेस का प्रदर्शन भी बृजेंद्र ओला का उत्साह बढ़ा रहा है।

दोनों प्रत्याशियों ने हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में भी हाथ आजमाया था। झुंझुनूं विधानसभा सीट से ओला जीत गए और शुभकरण चौधरी उदयपुरवाटी से हार गए थे। सांसद नरेंद्र कुमार का टिकट कटने का कारण भी विधानसभा चुनाव की हार था।

ज्योति मिर्धा के साथ सहानुभूति और मोदी लहर, बेनीवाल को कांग्रेस वोट बैंक का सहारा

बीजेपी प्रत्याशी ज्योति मिर्धा चुनाव में मोदी लहर और राम मंदिर निर्माण के साथ ही अपनी तीन हार को भी बड़ा मुद्दा बनाने के प्रयास में हैं।

इमोशनल कार्ड खेलते हुए वो खुद को चिड़िया बताते हुए जनता से अपील करती हैं कि इस चिड़िया को मारना या ज़िंदा रखना आपके हाथ है।

इस अपील का असर भी अब दिखने लगा है। इसके उलट हनुमान बेनीवाल के साथ अब खुद के जनाधार के साथ ही कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक जुड़ गया है।

साल 2019 में हनुमान बेनीवाल ने BJP के NDA अलायंस के साथ RLP प्रत्याशी के तौर पर लोकसभा का चुनाव लड़ा था।

उस समय डॉक्टर ज्योति मिर्धा ही बतौर कांग्रेस प्रत्याशी उनके सामने मैदान में थीं। ऐसे में नागौर में एक बार फिर ‘वही घोड़े और वही मैदान’ है, लेकिन प्रत्याशियों के पाले बदल गए हैं।

चूरू का चुनावी पारा : प्रत्याशी कोई और जुबां पर नाम किसी का

यह सीट हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव की लपटों से दहक रही है। मुद्दों से ज्यादा पिछले विधानसभा चुनाव में राजेंद्र राठौड़ की तारानगर सीट से हार और उसके बाद कस्वां की बीजेपी से टिकट कटने का विवाद पूरे क्षेत्र में छाया हुआ है। कस्वां के लिए ये चुनाव नाक का सवाल बन गया है, तो राजेंद्र राठौड़ के लिए प्रतिष्ठा का।

झाझड़िया के लिए प्रचार कर रहे राठौड़ चूरू में डेरा डाले हुए हैं। कभी नाम लेकर तो कभी बिना नाम लिए कस्वां पर निशाना साध रहे हैं। फिर इसके बाद कस्वां पलटवार करते हैं। इससे मामला कस्वां वर्सेस राठौड़ होता जा रहा है।

राहुल कस्वां के टिकट कटने को लेकर वोटर्स में दो तरह के पक्ष सामने आ रहे हैं। वोटर्स का एक धड़ा पुराने चेहरे का टिकट कटने और नए चेहरे को मौका देने के भाजपा के कदम का वेलकम कर रहा है।

वोट बैंक के नजरिए से देखें तो चूरू सीट पर सियासत किसी और ही दिशा में जा रही है। यहां मुकाबला एक ही समाज से जुड़े दो चेहरों के बीच है, लेकिन जातीय वोटों का ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है। इस ध्रुवीकरण को हवा दे रहा है, विधानसभा चुनाव के बाद कस्वां और राठौड़ के बीच का विवाद।

राजपूत समाज राठौड़ की हार का जिम्मेदार कस्वां को मान रहा है। इधर, कस्वां का टिकट कटने के बाद से जाट समाज नाराज है। समाज कस्वां का टिकट कटने के मामले में राठौड़ को जिम्मेदार मान रहा है।

इन राजनीतिक परिस्थितियों में टिकट कटने से जाट समाज की सहानुभूति कस्वां और राठौड़ की हार के कारण राजपूत समाज की सहानुभूति का फायदा बीजेपी प्रत्याशी झाझड़िया को मिल रहा है। झाझड़िया को राजपूत वोटर्स का साथ तो मिल रहा है, लेकिन खुद के समाज को साधने में उन्हें मशक्कत करनी पड़ रही है।

अलवर का चुनावी माहौल : अनुभव वर्सेस लोकल

चुनावी समीकरण देखें तो यहां की 8 विधानसभा सीटों में से 5 पर कांग्रेस के विधायक जीते हैं। भाजपा महज 3 सीटों पर है, लेकिन यह जीत का पैमाना नहीं है। पिछले लोकसभा के परिणाम देखें तो जहां से कांग्रेस के विधायक जीते थे, वहां भाजपा प्रत्याशी महंत बालकनाथ ने ज्यादा वोट हासिल किए थे। बहरोड़ और मुंडावर में एक लाख 80 हजार वोटों से भाजपा ने लीड बनाई थी।

ललित यादव राठ क्षेत्र से आते हैं। मुंडावर, बहरोड़ और बानसूर में उनकी पकड़ है, लेकिन अलवर शहर, अलवर ग्राामीण, रामगढ़ में उनकी सीधी पकड़ नहीं है। यहां पर वे पार्टी कार्यकताओं व स्थानीय नेताओं के भरोसे हैं। अलवर शहर और राजगढ़ में भंवर जितेंद्र सिंह की जरूर अच्छी पकड़ है।

भूपेंद्र यादव के लिए यह प्लस पॉइंट है कि शहरी क्षेत्रों में बीजेपी मजबूत स्थिति में है। वे ‘मोदी की गारंटी’ देकर प्रचार में जुटे हैं। मोदी की नजदीकी होने के कारण पार्टी के बड़े नेता से लेकर छोटे से छोटा कार्यकर्ता उनके साथ लगा हुआ है। उनके समर्थन में अमित शाह सभा कर चुके हैं।

अलवर शहर विधायक संजय शर्मा और पूर्व विधायक रामहेत यादव दोनों भूपेंद्र यादव के नजदीकी माने जाते हैं। दोनों पूरी ताकत से उनके चुनाव में साथ हैं। हालांकि महंत बालकनाथ को राजस्थान सरकार में कोई भी मंत्री पद नहीं मिलने की वजह से उनके समर्थकों में थोड़ा उत्साह कम है।

इस सीट पर भले ही सीधा मुकाबला बीजेपी-कांग्रेस में है लेकिन तीसरे फैक्टर के तौर पर बसपा भी मौजूद है। मेव मुस्लिम और एससी-एसटी वोटरों की अलवर लोकसभा क्षेत्र में बड़ी तादाद है।

पारंपरिक तौर पर दोनों को कांग्रेस अपना वोट बैंक मानती है, लेकिन यहां मेव लीडर तैयब हुसैन के बेटे फजल हुसैन बसपा के टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं। फजल हुसैन की मेव वोटर्स पर अच्छी पकड़ है। वहीं, बसपा पार्टी के जरिए एससी-एसटी वोट तैयब को मिल सकते हैं। राजनीतिक एक्सपर्ट का कहना है कि इस फैक्टर से कांग्रेस के वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी साबित हो सकती है।

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