तैस्स्तिोरी की 137 वीं जयंती पर सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा राजस्थानी भाषा महोत्सव का आगाज

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भारतीय कला संस्कृृति एवं पुरातत्व के क्षेत्र में डॉ. तैस्सितौरी का योगदान अद्वितीय : जोशी

तैस्स्तिोरी की 137 वीं जयंती पर सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा राजस्थानी भाषा महोत्सव का आगाज

बीकानेर । 13 दिसम्बर । सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट , बीकानेर के तत्वावधान में इटली मूल के राजस्थानी विद्वान डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी की 137वीं जयंती पर दो दिवसीय राजस्थानी भाषा महोत्सव का आगाज म्यूजियम परिसर स्थित डाॅ.एल.पी तैस्सितोरी की प्रतिमा स्थल पर पुष्पांजलि एवं विचाराजंली कार्यक्रम से किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आलोचक डॉ. उमाकांत गुप्त थे। अध्यक्षता कवि-कथाकार राजेन्द्र जोशी ने की तथा विशिष्ट अतिथि सखा संगम के अध्यक्ष एन.डी.रंगा एवं सहायक निदेशक जनसंपर्क हरिशंकर आचार्य रहे एवं मुख्य वक्ता व्यंग्यकार-संपादक डॉ. अजय जोशी थे। प्रारंभ में अतिथियों एवं उपस्थित लोगों ने डॉ. एल.पी.तैस्सितोरी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की।
इस अवसर पर बोलते हुए मुख्य अतिथि डॉ. उमाकांत गुप्त ने कहा तैस्सितोरी का व्यक्तित्व राजस्थानी भाषा भाषियों के लिए चुनौती पूर्ण है। उदीने से आकर राजस्थान में रहकर अद्भुत, विलक्षण और अविस्मरणीय कार्य किया । वे समर्पण, संयम, साहस का प्रयाग संगम का प्रतीक हैं। उन्होंने कहा हमें उनसे प्रेरणा लेकर संकल्प और निष्ठा से राजस्थानी के लिए जन आन्दोलनार्थ चेतना जागृत करनी होगी। तभी राजस्थानी की मान्यता सम्भव होगी।
इस अवसर पर अध्यक्षीय उद्बोधन में राजेन्द्र जोशी ने कहा कि डॉ. तैस्सितोरी महान् विद्वान एवं भाषाविद तो थे ही,भारतीय कला संस्कृति एवं पुरातत्व के क्षेत्र में उनका योगदान अद्वितीय था । जोशी ने कहा कि 5 वर्ष के दीर्घकाल तक यहां की विषम परिस्थितियों में अत्यधिक कठिनाइयां सहन करके भी उन्होंने विभिन्न घाटियों, रेत के टीलों, नगरों और मंदिरों, किलों तथा नगर के विभिन्न दुर्गों की यात्राएं की । उन्होंने कहा कि सरस्वती तथा दृषद्वती की सूखी घाटी में कालीबंगन में हड़प्पा पूर्व के प्रसिद्ध केंद्र की खोज करने का श्रेय सर्वप्रथम डॉ. तैस्सितोरी को ही जाता है।
एन.डी.रंगा ने कहा कि सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट के तत्वावधान में तैस्सितोरी को प्रति वर्ष श्रद्धा से स्मरण किया जाना संस्था का राजस्थानी भाषा के प्रति समर्पण है । उन्होंने कहा कि संस्था को शोध एवं अनुसंधान के क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है ।
मुख्य वक्ता डा.अजय जोशी ने डॉ. तैस्सितोरी के कार्यों को रेखांकित करते हुए कहा कि सन 1917 में वे यहां 5 अप्रैल से 10 अप्रैल तक रहे और कालीबंगन के प्रागैतिहासिक विशेषताओं से युक्त पत्थर की फालों, मिट्टी के वलयों तथा तश्तरियों, अस्थिनिर्मित उपकरणों तथा पात्रों के खंडों के साथ-साथ तीन पाषाण मुद्राएं भी भूमि से खोद निकाली।
विशिष्ट अतिथि हरिशंकर आचार्य ने कहा कि रॉयल एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका में डॉ तैस्सितोरी ने कालीबंगन सभ्यता के शोधकार्य की रिपोर्ट भेजी थी । उन्होंने कहा कि विदेशी मूल के विद्वानों ने राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है।
प्रारंभ में साहित्यकार राजाराम स्वर्णकार ने स्वागत भाषण करते हुए संस्था की गतिविधियों का विस्तार से परिचय दिया, स्वर्णकार ने डॉ.एल.पी.तैस्सितोरी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को भी विस्तार से प्रस्तुत किया।
म्यूजियम के अधीक्षक महेंद्र कुमार ने संबोधित करते हुए कहा कि हमें राजस्थानी भाषा के लिए घर-घर प्रचार प्रसार करना चाहिए।
कार्यक्रम में प्रोफेसर नरसिंह बिन्नाणी ने कहा कि राजस्थानी समर्थ भाषा है फिर भी हमारी राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं करना 10 करोड़ लोगों का अपमान करना है।
कार्यक्रम में डॉ. मोहम्मद फारूक चौहान, प्रेम प्रकाश व्यास, वास्तुकार डॉ. के.के. शर्मा पुस्तकालय अधीक्षक विमल शर्मा सहित अनेक लोगों ने संबोधित किया। कार्यक्रम के अंत में शायर अब्दुल शकूर सिसोदिया ने आभार प्रकट किया।
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शनिवार को राजस्थानी भाषा के विद्वानों एवं राजस्थानी भाषा के प्रबल समर्थकों का सम्मान होगा
राजस्थानी भाषा महोत्सव के दूसरे
दिन शनिवार को राजकीय सार्वजनिक पुस्तकालय के सभागार में दोपहर 2:15 बजे छह महानुभावों मनीषा आर्य सोनी, डॉ. नमामी शंकर आचार्य ,डॉ. कृष्णा आचार्य , डॉ. गौरी शंकर प्रजापत, डॉ. सत्य प्रकाश आचार्य एवं ड. नरेश गोयल को डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी अवार्ड से सम्मानित किया जाएगा। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि संभागीय आयुक्त वंदना सिंघवी होगी तथा अध्यक्षता महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मनोज दीक्षित करेंगे।

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