
पाकिस्तानी मूल के कनाडाई लेखक, विचारक और पत्रकार तारिक़ फ़तह की अन्तिम इच्छा थी कि उन्हें (पंचमहाभूत) पंचतत्व में विलीन किया जाए ताकि वे फिर से अपने पूर्वजों की पुण्यभूमि भारत में जन्म ले सकें। सोमवार 24 अप्रैल को उनका निधन हो गया था।
20 नवंबर 1949 को कराची के एक मुस्लिम परिवार में वो जन्मे लेकिन रक्त में पूर्वजों का प्रताप सदैव उन्हें भारत की ओर खींचता रहा। पिछले कुछ वर्षों से वो स्वयं को तारिक़ फ़तह सिंह कहलवाना पसंद करते थे। कुछ सदी पहले उनके पुरखे हिंदू राजपूतों से मुसलमान बने थे। मुस्लिम मजहब में पैदा हुए लेकिन अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए सत्य सनातन वैदिक धर्म को फिर से अपनाकर मृत्यु को प्राप्त हुए। कनाडा में उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति रिवाज के साथ किया गया।
तारिक़ फ़तह पहले मुस्लिम बुद्धिजीवी नहीं थे जिन्होंने पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) में विलीन होने की बात जीते जी कही हो, इससे पहले उर्दू साहित्य का सबसे बड़ा नाम “इस्मत चुग़ताई” ने भी जीते-जी अपनी वसीयत में यह लिखवाया था कि उन्हें मरने के बाद दफनाया न जाए। उनके शरीर को जलाया जाए। अक्टूबर, 1991 में मृत्यु के पश्चात मौलवियों ने ऐतराज जताया और हंगामा होने ही वाला था, तभी उनके बच्चों ने अपनी मां की अंतिम इच्छा पूरी की और मुंबई में उनका अंतिम संस्कार किया गया।







