बीकानेर, 03 अगस्त। राजकीय महारानी सुदर्शन कन्या महाविद्यालय, बीकानेर में अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (उच्च शिक्षा), राजस्थान की स्थानीय इकाई एवं संस्कृत विभाग के संयुक्त तत्वावधान में गुरु पूर्णिमा महोत्सव का गरिमामय आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शिक्षकों, छात्राओं एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों की उत्साहपूर्ण सहभागिता रही। भारतीय संस्कृति में गुरु के सर्वोच्च स्थान एवं गुरु-शिष्य परम्परा के महत्व को रेखांकित करते हुए आयोजित इस समारोह में आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं माल्यार्पण से हुआ। इसके उपरांत संगीत विभाग की छात्राओं ने प्रो. असित गोस्वामी के संयोजन एवं निर्देशन में सरस्वती वंदना की भावपूर्ण प्रस्तुति देकर सम्पूर्ण वातावरण को भक्तिमय एवं आध्यात्मिक बना दिया। छात्राओं की प्रस्तुति को उपस्थित सभी अतिथियों एवं श्रोताओं ने सराहा।
महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. रजनी रमण झा ने सभी अतिथियों का आत्मीय स्वागत करते हुए उनका परिचय कराया तथा कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परम्परा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन अवसर है। उन्होंने कहा कि गुरु समाज में संस्कार, ज्ञान और चरित्र निर्माण का आधार होते हैं तथा विद्यार्थियों को जीवन की सही दिशा प्रदान करते हैं।
विशिष्ट वक्ता अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के संगठन मंत्री प्रो. दिविजय सिंह ने कहा कि गुरु केवल विद्यार्थी को शिक्षित नहीं करता, बल्कि उसे एक श्रेष्ठ मनुष्य बनने की दिशा में प्रेरित करता है। इसी उद्देश्य से संगठन प्रतिवर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरु वंदन कार्यक्रम आयोजित करता है इससे समाज गुरु के महत्व से परिचित हो सके ।उन्होंने कहा कि गुरु अपने शिष्य को विनम्रता, अनुशासन, सेवा, समर्पण तथा जीवन में झुककर सीखने का संस्कार प्रदान करता है। जिस समाज में गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान की भावना बनी रहती है, वही समाज नैतिक रूप से सशक्त एवं समृद्ध बनता है।
मुख्य वक्ता श्रीमती रचना भाटिया ने अपने उद्बोधन में कहा कि वर्तमान समय में जीवन अनेक प्रकार के द्वंद्व, तनाव और असमंजस से घिरा हुआ है। ऐसी परिस्थितियों में गुरु का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक एवं अपरिहार्य हो जाता है। उन्होंने कहा कि गुरु व्यक्ति को सही और गलत का विवेक प्रदान करता है तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संतुलित एवं सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने की प्रेरणा देता है। संवाद के माध्यम से उन्होंने छात्राओं कोमार्गदर्शन प्रदान किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में स्वामी विमर्शानन्द जी महाराज ने कहा कि “गुरु तत्व की आराधना ही भारतीय संस्कृति की आत्मा है।” उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब नई पीढ़ी तकनीक और सूचना के विशाल संसार से जुड़ी हुई है, तब गुरु का महत्व और भी बढ़ जाता है। ज्ञान प्राप्त करना सरल हो सकता है, लेकिन ज्ञान को विवेक, संस्कार और जीवन के सही मार्ग में परिवर्तित करना केवल गुरु ही सिखाता है। उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल परंपरा का उत्सव नहीं, बल्कि अपने जीवन में मार्गदर्शन देने वाले गुरुजनों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और समर्पण व्यक्त करने का पावन अवसर है।
उन्होंने आगे कहा कि जीवन में जब भी भ्रम, तनाव, नैतिक द्वंद्व या निर्णय लेने की कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, तब गुरु ही सही दिशा दिखाकर व्यक्ति को लक्ष्य तक पहुँचाने का कार्य करता है। गुरु शिष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करता है, उसमें विनम्रता, अनुशासन, सेवा, संयम और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना का विकास करता है। उन्होंने कहा कि यदि आज की युवा पीढ़ी गुरु के बताए आदर्शों को अपने जीवन में अपनाए, तो वह न केवल व्यक्तिगत रूप से सफल होगी, बल्कि एक सशक्त, संस्कारित और विकसित भारत के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसलिए प्रत्येक विद्यार्थी को अपने गुरु के प्रति सम्मान, विश्वास और आजीवन कृतज्ञता का भाव बनाए रखना चाहिए।
कार्यक्रम का प्रभावी एवं आकर्षक संचालन एबीआरएसएम की इकाई सचिव प्रो. राधा सोलंकी ने किया। उन्होंने कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों का सुचारु संचालन करते हुए गुरु पूर्णिमा के महत्व पर भी प्रकाश डाला। अंत में प्रो. अभिलाषा ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, आयोजकों एवं उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस अवसर पर महाविद्यालय के समस्त शिक्षकगण, शिक्षणेतर कर्मचारी, शोधार्थी तथा बड़ी संख्या में छात्राएँ उपस्थित रहीं। सम्पूर्ण कार्यक्रम श्रद्धा, ज्ञान, संस्कृति और भारतीय गुरु-शिष्य परम्परा के प्रति समर्पण की भावना से ओत-प्रोत रहा तथा उपस्थित सभी जनों के लिए प्रेरणादायी एवं स्मरणीय सिद्ध हुआ।

Categories: GENERAL NEWS





